महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 250, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘उसे देते समय मैंने कहा—‘वसुधे! यह अमोघ वैष्णवास्त्र नरकासुरकी रक्षाके लिये उसके पास रहे। फिर उसे कोई भी नष्ट नहीं कर सकेगा॥ ३३॥ अनेनास्त्रेण ते गुप्तः सुतः परबलार्दनः । भविष्यति दुराधर्षः सर्वलोकेषु सर्वदा ॥ ३४ ॥ ‘इस अस्त्रसे सुरक्षित रहकर तुम्हारा पुत्र शत्रुओंकी सेनाको पीड़ित करनेवाला और सदा सम्पूर्ण लोकोंमें दुर्धर्ष बना रहेगा’॥ ३४॥ तथेत्युक्त्वा गता देवी कृतकामा मनस्विनी । स चाप्यासीद् दुराधर्षो नरकः शत्रुतापनः ॥ ३५ ॥ ‘तब ‘जो आज्ञा’ कहकर मनस्विनी पृथ्वीदेवी कृतार्थ होकर चली गयी। वह नरकासुर भी (उस अस्त्रको पाकर) शत्रुओंको संताप देनेवाला तथा अत्यन्त दुर्जय हो गया॥ ३५॥ तस्मात् प्राग्ज्योतिषं प्राप्तं तदस्त्रं पार्थ मामकम् । नास्यावध्योऽस्ति लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष ॥ ३६ ॥ ‘पार्थ! नरकासुरसे वह मेरा अस्त्र इस प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्तको प्राप्त हुआ। आर्य! इन्द्र तथा रुद्रसहित तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो इस अस्त्रके लिये अवध्य हो॥ ३६॥ तन्मया त्वत्कृते चैतदन्यथा व्यपनामितम् । विमुक्तं परमास्त्रेण जहि पार्थ महासुरम् ॥ ३७ ॥ ‘अतः मैंने तुम्हारी रक्षाके लिये उस अस्त्रको दूसरे प्रकारसे उसके पाससे हटा दिया है। पार्थ! अब वह महान् असुर उस उत्कृष्ट अस्त्रसे वंचित हो गया है। अतः तुम उसे मार डालो॥ ३७॥ वैरिणं जहि दुर्धर्षं भगदत्तं सुरद्विषम् । यथाहं जघ्निवान् पूर्वं हितार्थं नरकं तथा ॥ ३८ ॥ ‘दुर्जय वीर भगदत्त तुम्हारा वैरी और देवताओंका द्रोही है। अतः तुम उसका वध कर डालो; जैसे कि मैंने पूर्वकालमें लोकहितके लिये नरकासुरका संहार किया था’॥ ३८॥ एवमुक्तस्तदा पार्थः केशवेन महात्मना । भगदत्तं शितैर्बाणैः सहसा समवाकिरत् ॥ ३९ ॥ महात्मा केशवके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुन उसी समय भगदत्तपर सहसा पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे॥ ३९॥ ततः पार्थो महाबाहुरसम्भ्रान्तो महामनाः । कुम्भयोरन्तरे नागं नाराचेन समर्पयत् ॥ ४० ॥ तत्पश्चात् महाबाहु महामना पार्थने बिना किसी घबराहटके हाथीके कुम्भस्थलमें एक नाराचका प्रहार किया॥ ४०॥ स समासाद्य तं नागं बाणो वज्र इवाचलम् ।