महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 251, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभ्यगात् सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः ॥ ४१ ॥ वह नाराच उस हाथीके मस्तकपर पहुँचकर उसी प्रकार लगा, जैसे वज्र पर्वतपर चोट करता है। जैसे सर्प बाँबीमें समा जाता है, उसी प्रकार वह बाण हाथीके कुम्भस्थलमें पंखसहित घुस गया ॥ ४१ ॥
स करी भगदत्तेन प्रेर्यमाणो मुहुर्मुहुः । न करोति वचस्तस्य दरिद्रस्येव योषिता ॥ ४२ ॥ वह हाथी बारंबार भगदत्तके हाँकनेपर भी उनकी आज्ञाका पालन नहीं करता था, जैसे दुष्टा स्त्री अपने दरिद्र स्वामीकी बात नहीं मानती है ॥ ४२ ॥
स तु विष्टभ्य गात्राणि दन्ताभ्यामवनिं ययौ । नदन्नार्तस्वनं प्राणानुत्ससर्ज महाद्विपः ॥ ४३ ॥ उस महान् गजराजने अपने अंगोंको निश्चेष्ट करके दोनों दाँत धरतीपर टेक दिये और आर्तस्वरसे चीत्कार करके प्राण त्याग दिये ॥ ४३ ॥
ततो गाण्डीवधन्वानमभ्यभाषत केशवः । अयं महत्तरः पार्थ पलितेन समावृतः ॥ ४४ ॥ वलीसंच्छन्ननयनः शूरः परमदुर्जयः । अक्ष्णोरुन्मीलनार्थाय बद्धपट्टो ह्यसौ नृपः ॥ ४५ ॥ तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने गाण्डीवधारी अर्जुनसे कहा—'कुन्तीनन्दन! यह भगदत्त बहुत बड़ी अवस्थाका है। इसके सारे बाल पक गये हैं और ललाट आदि अंगोंमें झुर्रियाँ पड़ जानेके कारण पलकें झपी रहनेसे इसके नेत्र प्रायः बंद-से रहते हैं। यह शूरवीर तथा अत्यन्त दुर्जय है। इस राजाने अपने दोनों नेत्रोंको खुले रखनेके लिये पलकोंको कपड़ेकी पट्टीसे ललाटमें बाँध रखा है' ॥ ४४-४५ ॥
देववाक्यात् प्रचिच्छेद शरेण भृशमर्जुनः । छिन्नमात्रेंऽशुके तस्मिन् रुद्धनेत्रो बभूव सः ॥ ४६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके कहनेसे अर्जुनने बाण मारकर भगदत्तके सिरकी पट्टी अत्यन्त छिन्न-भिन्न कर दी। उस पट्टीके कटते ही भगदत्तकी आँखें बंद हो गयीं ॥
तमोमयं जगन्मेने भगदत्तः प्रतापवान् । ततश्चन्द्रार्धबिम्बेन बाणेन नतपर्वणा ॥ ४७ ॥ बिभेद हृदयं राज्ञो भगदत्तस्य पाण्डवः । फिर तो प्रतापी भगदत्तको सारा जगत् अन्धकारमय प्रतीत होने लगा। उस समय झुकी हुई गाँठवाले एक अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा पाण्डुनन्दन अर्जुनने राजा भगदत्तके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया ॥ ४७ १/२ ॥
स भिन्नहृदयो राजा भगदत्तः किरीटिना ॥ ४८ ॥ शरासनं शरांश्चैव गतासुः प्रमुमोच ह ।