महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनरश्रेष्ठ अर्जुनने रथके द्वारा ही उस हाथीका सामना किया। रथ और हाथीका वह संघर्ष बड़ा भयंकर था ।। कल्पिताभ्यां यथाशास्त्रं रथेन च गजेन च । संग्रामे चेरतुर्वीरौ भगदत्तधनंजयौ ॥ २३ ॥ शास्त्रीय विधिके अनुसार निर्मित और सुसज्जित रथ तथा सुशिक्षित हाथीके द्वारा वीरवर अर्जुन और भगदत्त संग्रामभूमिमें विचरने लगे ।। २३ ।। ततो जीमूतसंकाशान्नागादिन्द्र इव प्रभुः । अभ्यवर्षच्छरौघेण भगदत्तो धनंजयम् ॥ २४ ॥ तदनन्तर इन्द्रके समान शक्तिशाली राजा भगदत्त अर्जुनपर मेघ-सदृश हाथीसे बाणसमूहरूपी जलराशिकी वर्षा करने लगे ।। २४ ।। स चापि शरवर्षं तं शरवर्षेण वासविः । अप्राप्तमेव चिच्छेद भगदत्तस्य वीर्यवान् ॥ २५ ॥ इधर पराक्रमी इन्द्रकुमार अर्जुनने अपने बाणोंकी वृष्टिसे भगदत्तकी बाण-वर्षाको अपने पासतक पहुँचनेके पहले ही छिन्न-भिन्न कर दिया ।। २५ ।। ततः प्राग्ज्योतिषो राजा शरवर्षं निवार्य तत् । शरैरर्जघ्ने महाबाहुं पार्थं कृष्णं च मारिष ॥ २६ ॥ आर्य! तदनन्तर प्राग्ज्योतिषनरेश राजा भगदत्तने भी विपक्षीकी उस बाण-वर्षाका निवारण करके महाबाहु अर्जुन और श्रीकृष्णको अपने बाणोंसे घायल कर दिया ।। ततस्तु शरजालेन महताभ्यवकीर्य तौ । चोदयामास तं नागं वधायाच्युतपार्थयोः ॥ २७ ॥ फिर उनके ऊपर बाणोंका महान् जाल-सा बिछाकर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंके वधके लिये उस गजराजको आगे बढ़ाया ।। २७ ।। तमापतन्तं द्विरदं दृष्ट्वा क्रुद्धमिवान्तकम् । चक्रेऽपसव्यं त्वरितः स्यन्दनेन जनार्दनः ॥ २८ ॥ क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान उस हाथीको आक्रमण करते देख भगवान् श्रीकृष्णने तुरंत ही रथद्वारा उसे अपने दाहिने कर दिया ।। २८ ।। तं प्राप्तमपि नैयेष परावृत्तं महाद्विपम् । सारोहं मृत्युसात्कर्तुं स्मरन् धर्मं धनंजयः ॥ २९ ॥ यद्यपि वह महान् गजराज आक्रमण करते समय अपने बहुत निकट आ गया था, तो भी अर्जुनने धर्मका स्मरण करके सवारोंसहित उस हाथीको मृत्युके अधीन करनेकी इच्छा नहीं की* ।। २९ ।। स तु नागो द्विपारथान् हयांश्चामृद्य मारिष । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय ततः क्रुद्धो धनंजयः ॥ ३० ॥