भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2295

फिर महानुभाव कर्णपुत्र वीर वृषसेन युद्धस्थलमें कुन्तीकुमार अर्जुनको तुरंत ही एक तीखे बाणसे घायल करके बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। ठीक वैसे ही, जैसे नमुचिने इन्द्रको बींधकर सिंहनाद किया था ।। पुनः स पार्थं वृषसेन उग्रै- र्बाणैरविद्ध्याद् भुजमवले तु सव्ये ।। २७ ।। तथैव कृष्णं नवभिः समार्दयत् पुनश्च पार्थं दशभिर्जघान । इसके बाद वृषसेनने भयंकर बाणोंद्वारा अर्जुनकी बायीं भुजाके मूलभागमें पुनः प्रहार किया तथा नौ बाणोंसे श्रीकृष्णको भी चोट पहुँचाकर दस बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको फिर घायल कर दिया ।। २७ १/२ ।। पूर्वं यथा वृषसेनप्रयुक्तै- रभ्याहतः श्वेतहयः शरैस्तैः ।। २८ ।। संरम्भमीषदगमितो वधाय कर्णात्मजस्याथ मनः प्रदध्रे । वृषसेनके चलाये हुए उन बाणोंद्वारा पहले ही आहत होकर श्वेतवाहन अर्जुनके मनमें थोड़ा-सा क्रोध जाग्रत् हुआ। फिर उन्होंने मन-ही-मन कर्णकुमारके वधका निश्चय किया ।। २८ १/२ ।। ततः किरीटी रणमूर्ध्नि कोपात् कृत्वा त्रिशाखां भृकुटिं ललाटे ।। २९ ।। मुमोच तूर्णं विशिखान् महात्मा वधे धृतः कर्णसुतस्य संख्ये । तदनन्तर किरीटधारी महात्मा अर्जुनने युद्धस्थलमें कर्णपुत्रके वधका दृढ़ निश्चय करके अपने ललाटमें स्थित भौंहोंको क्रोधपूर्वक तीन जगहसे टेढ़ी करके युद्धके मुहानेपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंका प्रहार आरम्भ किया ।। आरक्तनेत्रोऽन्तकशत्रुहन्ता उवाच कर्णं भृशमुत्स्मयंस्तदा ।। ३० ।। दुर्योधनं द्रौणिमुखांश्च सर्वा- नहं रणे वृषसेनं तमुग्रम् । सम्पश्यतः कर्ण तवाद्य संख्ये नयामि लोकं निशितैः पृषत्कैः ।। ३१ ।। उस समय उनके नेत्र रोषसे कुछ लाल हो गये थे। वे यमराज-जैसे शत्रुको भी मार डालनेमें समर्थ थे। उस समय उन्होंने मुसकराते हुए वहाँ कर्ण, दुर्योधन और अश्वत्थामा