महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2296, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि सब वीरोंको लक्ष्य करके कहा—'कर्ण! आज युद्धस्थलमें मैं तुम्हारे देखते-देखते उस उग्रपराक्रमी वीर वृषसेनको अपने पैने बाणोंद्वारा यमलोक भेज दूँगा।।
ऊनं च तावद्धि जना वदन्ति सर्वैर्भवद्भिर्मम सूनुर्हतोऽसौ। एको रथो मद्विहीनस्तरस्वी अहं हनिष्ये भवतां समक्षम्॥ ३२॥ संरक्ष्यतां रथसंस्थाः सुतोऽय- महं हनिष्ये वृषसेनमुग्रम्। पश्चाद् वधिष्ये त्वामपि सम्प्रमूढ- महं हनिष्येऽर्जुन आजिमध्ये॥ ३३॥
'मेरा वेगशाली वीर पुत्र महारथी अभिमन्यु अकेला था। मैं उसके साथ नहीं था। उस अवस्थामें तुम सब लोगोंने मिलकर उसका वध किया था। तुम्हारे उस कर्मको सब लोग खोटा बताते हैं; परंतु आज मैं तुम सब लोगोंके सामने वृषसेनका वध करूँगा। रथपर बैठे हुए महारथियो! अपने इस पुत्रको बचा सको तो बचाओ। मैं अर्जुन आज रणभूमिमें पहले उग्रवीर वृषसेनको मारूँगा; फिर तुझ विवेकशून्य सूतपुत्रका भी वध कर डालूँगा॥ ३२-३३॥
तमद्य मूलं कलहस्य संख्ये दुर्योधनापाश्रयजातदर्पम्। त्वामद्य हन्तास्मि रणे प्रसह्य अस्यैव हन्ता युधि भीमसेनः॥ ३४॥ दुर्योधनस्याधमपूरुषस्य यस्यानयादेष महान् क्षयोऽभवत्।
'कर्ण! तू ही इस कलहकी जड़ है। दुर्योधनका सहारा मिल जानेसे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है। आज रणक्षेत्रमें मैं हठपूर्वक तेरा वध करूँगा और जिसके अन्यायसे यह महान् संहार हुआ है, उस नराधम दुर्योधनका वध युद्धमें भीमसेन करेंगे'॥ ३४ १/२॥
स एवमुक्त्वा विनिमृज्य चापं लक्ष्यं हि कृत्वा वृषसेनमाजौ॥ ३५॥ ससर्ज बाणान् विशिखान् महात्मा वधाय राजन् कर्णसुतस्य संख्ये।
राजन्! ऐसा कहकर महात्मा अर्जुनने अपने धनुषको पोंछा और कर्णपुत्र वृषसेनका वध करनेके लिये युद्धमें उसीको लक्ष्य बनाकर बाणोंका प्रहार आरम्भ किया॥ ३५ १/२॥
विव्याध चैनं दशभिः पृषत्कै- र्मर्मस्वशङ्कं प्रहसन् किरीटी॥ ३६॥