महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2352, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदर्जुनास्त्रं व्यधमद् दहन्तं कर्णस्तु बाणैर्निशितैर्महात्मा ॥ ४ ॥ महामनस्वी वीर कर्णने परशुरामजीसे प्राप्त हुए महाप्रभावशाली शत्रुनाशक आथर्वण अस्त्रका प्रयोग करके पैने बाणोंद्वारा अर्जुनके उस अस्त्रको, जो कौरव-सेनाको दग्ध कर रहा था, नष्ट कर दिया ॥ ४ ॥
ततो विमर्दः सुमहान् बभूव तत्रार्जुनस्याधिरथेश्च राजन् । अन्योन्यमासादयतोः पृषत्कै- र्विषाणघातैर्द्विपयोरिवोग्रैः ॥ ५ ॥ राजन्! जैसे दो हाथी अपने भयंकर दाँतोंसे एक-दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार अर्जुन और कर्ण एक-दूसरेपर बाणोंका प्रहार कर रहे थे। उस समय उन दोनोंमें बड़ा भारी युद्ध होने लगा ॥ ५ ॥
तत्रास्त्रसंघातसमावृतं तदा बभूव राजंस्तुमुलं स्म सर्वतः । तत् कर्णपार्थौ शरवृष्टिसंघै- र्निरन्तरं चक्रतुरम्बरं तदा ॥ ६ ॥ नरेश्वर! उस समय वहाँ अस्त्रसमूहोंसे आच्छादित होकर सारा प्रदेश सब ओरसे भयंकर प्रतीत होने लगा। कर्ण और अर्जुनने अपने बाणोंकी वर्षासे आकाशको ठसाठस भर दिया ॥ ६ ॥
ततो जालं बाणमयं महान्तं सर्वेऽद्राक्षुः कुरवः सोमकाश्च । नान्यं च भूतं ददृशुस्तदा ते बाणान्धकारे तुमुलेऽथ किंचित् ॥ ७ ॥ तदनन्तर समस्त कौरवों और सोमकोंने भी देखा कि वहाँ बाणोंका विशाल जाल फैल गया है। बाणजनित उस भयानक अन्धकारमें उस समय उन्हें दूसरे किसी प्राणीका दर्शन नहीं होता था ॥ ७ ॥
(ततस्तु तौ वै पुरुषप्रवीरौ राजन् वरौ सर्वधनुर्धराणाम् । त्यक्त्वाऽऽत्मदेहौ समरेऽतिघोरे प्राप्तश्रमौ शत्रुदुरासदौ हि ॥ दृष्ट्वा तु तौ संयति सम्प्रयुक्तौ परस्परं छिद्रनिविष्टदृष्टी । देवर्षिगन्धर्वगणाः सयक्षाः