महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2353, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंतुष्टुवुस्तौ पितरश्च हृष्टाः ॥) राजन्! सम्पूर्ण धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ वे दोनों नरवीर उस भयानक समरमें अपने शरीरोंका मोह छोड़कर बड़ा भारी परिश्रम कर रहे थे, वे दोनों ही शत्रुओंके लिये दुर्जय थे। युद्धमें तत्पर होकर एक-दूसरेके छिद्रोंकी ओर दृष्टि रखनेवाले उन दोनों वीरोंको देखकर देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और पितर सभी हर्षमें भरकर उनकी प्रशंसा करने लगे।
तौ संदधानावनिशं च राजन् समस्यन्तौ चापि शराननेकान् । संदर्शयेतां युधि मार्गान् विचित्रान् धनुर्धरौ तौ विविधै कृतास्त्रैः ॥ ८ ॥ राजन्! निरन्तर अनेकानेक बाणोंका संधान और प्रहार करते हुए वे दोनों धनुर्धर वीर सिद्ध किये हुए विविध अस्त्रोंद्वारा युद्धमें अद्भुत पैंतरे दिखाने लगे ॥ ८ ॥
तयोरेवं युध्यतोराजिमध्ये सूतात्मजोऽभूदधिकः कदाचित् । पार्थः कदाचित् त्वधिकः किरीटी वीर्यास्त्रमायाबलपौरुषेण ॥ ९ ॥ इस प्रकार संग्रामभूमिमें जूझते समय उन दोनों वीरोंमें पराक्रम, अस्त्रसंचालन, मायाबल तथा पुरुषार्थकी दृष्टिसे कभी सूतपुत्र कर्ण बढ़ जाता था और कभी किरीटधारी अर्जुन ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा तयोस्तं युधि सम्प्रहारं परस्परस्यान्तरमीक्षमाणयोः । घोरं तयोर्दुविषहं रणेऽन्यै- र्योधाः सर्वे विस्मयमभ्यगच्छन् ॥ १० ॥ युद्धस्थलमें एक-दूसरेपर प्रहार करनेका अवसर देखते हुए उन दोनों वीरोंका दूसरोंके लिये दुःसह वह घोर आघात-प्रत्याघात देखकर रणभूमिमें खड़े हुए समस्त योद्धा आश्चर्यसे चकित हो उठे ॥ १० ॥
ततो भूतान्यन्तरिक्षस्थितानि तौ कर्णपार्थौ प्रशशंसुरिन्द्र । भोः कर्ण साध्वर्जुन साधु चेति वियत्सु वाणी श्रूयते सर्वतोऽपि ॥ ११ ॥ नरेन्द्र! उस समय आकाशमें स्थित हुए प्राणी कर्ण और अर्जुन दोनोंकी प्रशंसा करने लगे। 'वाह रे कर्ण!' 'शाबाश अर्जुन!' यही बात अन्तरिक्षमें सब ओर सुनायी देने लगी ॥ ११ ॥
तस्मिन् विमर्दे रथवाजिनागै-