भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2354

स्तदाभिघातैर्दलिते हि भूतले । ततस्तु पातालतले शयानो नागोऽश्वसेनः कृतवैरोऽर्जुनेन ॥ १२ ॥ राजंस्तदा खाण्डवदाहमुक्तो विवेश कोपाद् वसुधातले यः । अथोत्पपातोर्ध्वगतिर्जवेन संदृश्य कर्णार्जुनयोर्विमर्दम् ॥ १३ ॥ राजन्! उस समय घमासान युद्धमें जब रथ, घोड़े और हाथियोंद्वारा सारा भूतल रौंदा जा रहा था, उस समय पातालनिवासी अश्वसेन नामक नाग, जिसने अर्जुनके साथ वैर बाँध रखा था और जो खाण्डवदाहके समय जीवित बचकर क्रोधपूर्वक इस पृथ्वीके भीतर घुस गया था; कर्ण तथा अर्जुनका वह संग्राम देखकर बड़े वेगसे ऊपरको उछला और उस युद्धस्थलमें आ पहुँचा; उसमें ऊपरको उड़नेकी भी शक्ति थी ॥ १२-१३ ॥

अयं हि कालोऽस्य दुरात्मनो वै पार्थस्य वैरप्रतियातनाय । संचिन्त्य तूणं प्रविवेश चैव कर्णस्य राजन् शररूपधारी ॥ १४ ॥ नरेश्वर! वह यह सोचकर कि 'दुरात्मा अर्जुनके वैरका बदला लेनेके लिये यही सबसे अच्छा अवसर है' बाणका रूप धारण करके कर्णके तरकसमें घुस गया ॥

ततोऽस्त्रसंघातसमाकुलं तदा बभूव जन्यं विततांशुजालम् । तत् कर्णपार्थौ शरसंघवृष्टिभि- र्निरन्तरं चक्रतुरम्बरं तदा ॥ १५ ॥ तदनन्तर अस्त्रसमूहोंके प्रहारसे भरा हुआ वह युद्धस्थल ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो वहाँ किरणोंका जाल बिछ गया हो। कर्ण और अर्जुनने अपने बाणसमूहोंकी वर्षासे आकाशमें तिलभर भी अवकाश नहीं रहने दिया ॥

तद् बाणजालैकमयं महान्तं सर्वेऽत्रसन् कुरवः सोमकाश्च । नान्यत् किंचिद् ददृशुः सम्पतद् वै बाणान्धकारे तुमुलेऽतिमात्रम् ॥ १६ ॥ वहाँ बाणोंका एक महाजाल-सा बना हुआ देखकर कौरव और सोमक सभी भयसे थर्रा उठे। उस अत्यन्त घोर बाणान्धकारमें उन्हें दूसरा कुछ भी गिरता नहीं दिखायी देता था ॥ १६ ॥

ततस्तौ पुरुषव्याघ्रौ सर्वलोकधनुर्धरौ ।