भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2355

त्यक्तप्राणौ रणे वीरौ युद्धश्रममुपागतौ । समुत्क्षेपैर्वीज्यमानौ सिक्तौ चन्दनवारिणा ॥ १७ ॥ सवालव्यजनैर्दिव्यैर्दिविस्थैरप्सरोगणैः । शक्रसूर्यकराब्जाभ्यां प्रमार्जितमुखावुभौ ॥ १८ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण विश्वके विख्यात धनुर्धर वीर पुरुषसिंह कर्ण और अर्जुन प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते-करते थक गये। उस समय आकाशमें खड़ी हुई अप्सराओंने दिव्य चँवर डुलाकर उन दोनोंको चन्दनके जलसे सींचा। फिर इन्द्र और सूर्यने अपने कर-कमलोंसे उनके मुँह पोंछे ॥

कर्णोऽथ पार्थं न विशेषयद् यदा भृशं च पार्थेन शराभितप्तः । ततस्तु वीरः शरविक्षताङ्गो दध्रे मनो ह्योकशयस्य तस्य ॥ १९ ॥ जब किसी तरह कर्ण युद्धमें अर्जुनसे बढ़कर पराक्रम न दिखा सका और अर्जुनने अपने बाणोंकी मारसे उसे अत्यन्त संतप्त कर दिया, तब बाणोंके आघातसे सारा शरीर क्षत-विक्षत हो जानेके कारण वीर कर्णने उस सर्पमुख बाणके प्रहारका विचार किया ॥ १९ ॥

ततो रिपुघ्नं समधत्त कर्णः सुसंचितं सर्पमुखं ज्वलन्तम् । रौद्रं शरं संनतमुग्रधौतं पार्थार्थमत्यर्थचिराभिगुप्तम् ॥ २० ॥ सदार्चितं चन्दनचूर्णशायितं सुवर्णतूणीरशयं महार्चिषम् । आकर्णपूर्णं च विकृष्य कर्णः पार्थोन्मुखः संदधे चोत्तमौजाः ॥ २१ ॥ उत्तम बलशाली कर्णने अर्जुनको मारनेके लिये ही जिसे सुदीर्घकालसे सुरक्षित रख छोड़ा था, सोनेके तरकसमें चन्दनके चूर्णके अंदर जिसे रखता था और सदा जिसकी पूजा करता था, उस शत्रुनाशक, झुकी हुई गाँठवाले, स्वच्छ, महातेजस्वी, सुसंचित, प्रज्वलित एवं भयानक सर्पमुख बाणको उसने धनुषपर रखा और कानतक खींचकर अर्जुनकी ओर संधान किया ॥

प्रदीप्तमैरावतवंशसम्भवं शिरो जिहीर्षुर्युधि सव्यसाचिनः । ततः प्रजज्वाल दिशो नभश्च उल्काश्च घोराः शतशः प्रपेतुः ॥ २२ ॥