भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2356

कर्ण युद्धमें सव्यसाची अर्जुनका मस्तक काट लेना चाहता था। उसका चलाया हुआ वह प्रज्वलित बाण ऐरावतकुलमें उत्पन्न अश्वसेन ही था। उस बाणके छूटते ही सम्पूर्ण दिशाओंसहित आकाश जाज्वल्यमान हो उठा। सैकड़ों भयंकर उल्काएँ गिरने लगीं ॥ २२ ॥

तस्मिंस्तु नागे धनुषि प्रयुक्ते हाहाकृता लोकपालाः सशक्राः । न चापि तं बुबुधे सूतपुत्रो बाणे प्रविष्टं योगबलेन नागम् ॥ २३ ॥

धनुषपर उस नागका प्रयोग होते ही इन्द्रसहित सम्पूर्ण लोकपाल हाहाकार कर उठे। सूतपुत्रको भी यह मालूम नहीं था कि मेरे इस बाणमें योगबलसे नाग घुसा बैठा है ॥ २३ ॥

दशशतनयनोऽहिं दृश्य बाणे प्रविष्टं निहत इति सुतो मे स्रस्तगात्रो बभूव । जलजकुसुमयोनिः श्रेष्ठभावो जितात्मा त्रिदशपतिमवोचन्मा व्यथिष्ठा जये श्रीः ॥ २४ ॥

सहस्रनेत्रधारी इन्द्र उस बाणमें सर्पको घुसा हुआ देख यह सोचकर शिथिल हो गये कि 'अब तो मेरा पुत्र मारा गया।' तब मनको वशमें रखनेवाले श्रेष्ठस्वभाव कमलयोनि ब्रह्माजीने उन देवराज इन्द्रसे कहा—'देवेश्वर! दुःखी न होओ। विजयश्री अर्जुनको ही प्राप्त होगी' ॥ २४ ॥

ततोऽब्रवीन्मद्रराजो महात्मा दृष्ट्वा कर्णं प्रहितेषुं तमुग्रम् । न कर्ण ग्रीवामिषुरेष लप्स्यते समीक्ष्य संधत्स्व शरं शिरोध्रम् ॥ २५ ॥

उस समय महामनस्वी मद्रराज शल्यने कर्णको उस भयंकर बाणका प्रहार करनेके लिये उद्यत देख उससे कहा—'कर्ण! तुम्हारा यह बाण शत्रुके कण्ठमें नहीं लगेगा; अतः सोच-विचारकर फिरसे बाणका संधान करो, जिससे वह मस्तक काट सके' ॥ २५ ॥

अथाब्रवीत् क्रोधसंरक्तनेत्रो मद्राधिपं सूतपुत्रस्तरस्वी । न संधत्ते द्विः शरं शल्य कर्णो न मादृशा जिह्मयुद्धा भवन्ति ॥ २६ ॥

यह सुनकर वेगशाली सूतपुत्र कर्णके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उसने मद्रराजसे कहा—'कर्ण दो बार बाणका संधान नहीं करता। मेरे-जैसे वीर कपटपूर्वक युद्ध नहीं करते हैं' ॥ २६ ॥

इतीदमुक्त्वा विससर्ज तं शरं