भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2360

विना किरीटं शुशुभे स पार्थः श्यामो युवा नील इवोच्चशृङ्गः । ततः समुद्ग्रथ्य सितेन वाससा स्वमूर्धजानव्यथितस्तदार्जुनः । विभासितः सूर्यमरीचिना दृढं शिरोगतेनोदयपर्वतो यथा ॥ ४१ ॥ मुकुट गिर जानेपर श्यामवर्ण, नवयुवक अर्जुन ऊँचे शिखरवाले नीलगिरिके समान शोभा पाने लगे। उस समय उन्हें तनिक भी व्यथा नहीं हुई। वे अपने केशोंको सफेद वस्त्रसे बाँधकर युद्धके लिये डटे रहे। श्वेत वस्त्रसे केश बाँधनेके कारण वे शिखरपर फैली हुई सूर्यदेवकी किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले उदयाचलके समान सुशोभित हुए ॥

गोकर्णा सुमुखी कृतेन इषुणा गोपुत्रसम्प्रेषिता गोशब्दात्मजभूषणं सुविहितं सुव्यक्तगोऽसुप्रभम् । दृष्ट्वा गोगतकं जहार मुकुटं गोशब्दगोपूरि वै गोकर्णासनमर्दनश्च न ययावप्राप्य मृत्योर्वशम् ॥ ४२ ॥ अंशुमाली सूर्यके पुत्र कर्णने जिसे चलाया था, जो अपने ही द्वारा उत्पादित एवं सुरक्षित बाणरूपधारी पुत्रके रूपमें मानो स्वयं उपस्थित हुई थी, गौ अर्थात् नेत्रेन्द्रियसे कानोंका काम लेनेके कारण जो गोकर्णा (चक्षुःश्रवा) और मुखसे पुत्रकी रक्षा करनेके कारण सुमुखी कही गयी है, उस सर्पिणीने तेज और प्राणशक्तिसे प्रकाशित होनेवाले अर्जुनके मस्तकको घोड़ोंकी लगामके सामने लक्ष्य करके (चलनेपर भी रथ नीचा होनेसे उसे न पाकर) उनके उस मुकुटको ही हर लिया, जिसे ब्रह्माजीने स्वयं सुन्दररूपसे इन्द्रके मस्तकका भूषण बनाया था और जो सूर्यसदृश किरणोंकी प्रभासे जगत्‌को परिपूर्ण (प्रकाशित) करनेवाला था। उक्त सर्पको अपने बाणोंकी मारसे कुचल देनेवाले अर्जुन उसे पुनः आक्रमणका अवसर न देनेके कारण मृत्युके अधीन नहीं हुए ॥ ४२ ॥

स सायकः कर्णभुजप्रसृष्टो हुताशनार्कप्रतिमो महार्हः । महोरगः कृतवैरोऽर्जुनेन किरीटमाहत्य ततो व्यतीयात् ॥ ४३ ॥ कर्णके हाथोंसे छूटा हुआ वह अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, बहुमूल्य बाण, जो वास्तवमें अर्जुनके साथ वैर रखनेवाला महानाग था, उनके किरीटपर आघात करके पुनः वहाँसे लौट पड़ा ॥ ४३ ॥

तं चापि दग्ध्वा तपनीयचित्रं किरीटमाकृष्य तदर्जुनस्य । इयेष गन्तुं पुनरेव तूर्णं