महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2361, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदृष्टश्च कर्णेन ततोऽब्रवीत् तम् ॥ ४४ ॥ अर्जुनका वह मुकुट सुवर्णमय होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करता था। उसे खींचकर अपनी विषाग्निसे दग्ध करके वह सर्प पुनः कर्णके तरकसमें घुसना ही चाहता था कि कर्णकी दृष्टि उसपर पड़ गयी। तब उसने कर्णसे कहा— ॥ ४४ ॥
मुक्तस्त्वयाहं त्वसमीक्ष्य कर्ण शिरो हृतं यन्न मयार्जुनस्य । समीक्ष्य मां मुञ्च रणे त्वमाशु हन्तास्मि शत्रुं तव चात्मनश्च ॥ ४५ ॥ ‘कर्ण! तुमने अच्छी तरह सोच-विचारकर मुझे नहीं छोड़ा था; इसीलिये मैं अर्जुनके मस्तकका अपहरण न कर सका। अब पुनः सोच-समझकर, ठीकसे निशाना साधकर रणभूमिमें शीघ्र ही मुझे छोड़ो, तब मैं अपने और तुम्हारे उस शत्रुका वध कर डालूँगा’ ॥ ४५ ॥
स एवमुक्तो युधि सूतपुत्र- स्तमब्रवीत् को भवानुग्ररूपः । नागोऽब्रवीद् विद्धि कृतागसं मां पार्थेन मातृवधजातवैरम् ॥ ४६ ॥ यदि स्वयं वज्रधरोऽस्य गोप्ता तथापि याता पितृराजवेश्मनि । युद्धस्थलमें उस नागके ऐसा कहनेपर सूतपुत्र कर्णने उससे पूछा—‘पहले यह तो बताओ कि ऐसा भयानक रूप धारण करनेवाले तुम हो कौन?’ तब नागने कहा—‘अर्जुनने मेरा अपराध किया है। मेरी माताका उनके द्वारा वध होनेके कारण मेरा उनसे वैर हो गया है। तुम मुझे नाग समझो। यदि साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी अर्जुनकी रक्षाके लिये आ जायँ तो भी आज अर्जुनको यमलोकमें जाना ही पड़ेगा’ ॥ ४६ ½ ॥
कर्ण उवाच
न नाग कर्णोऽद्य रणे परस्य बलं समास्थाय जयं बुभूषेत् ॥ ४७ ॥ न संदध्यां द्विः शरं चैव नाग यद्यर्जुनानां शतमैव हन्याम् । कर्ण बोला—नाग! आज रणभूमिमें कर्ण दूसरेके बलका सहारा लेकर विजय पाना नहीं चाहता है। नाग! मैं सौ अर्जुनको मार सकूँ तो भी एक बाणका दो बार संधान नहीं कर सकता ॥ ४७ ½ ॥
तमाह कर्णः पुनरेव नागं