महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2362, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदाऽऽजिमध्ये रविसूनुसत्तमः ॥ ४८ ॥ व्यालास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभि- र्हन्तास्मि पार्थं सुसुखी व्रज त्वम् । इतना कहकर सूर्यके श्रेष्ठ पुत्र कर्णने युद्धस्थलमें उस नागसे फिर इस प्रकार कहा—'मेरे पास सर्पमुख बाण है। मैं उत्तम यत्न कर रहा हूँ और मेरे मनमें अर्जुनके प्रति पर्याप्त रोष भी है; अतः मैं स्वयं ही पार्थको मार डालूँगा। तुम सुखपूर्वक यहाँसे पधारो' ॥
इत्येवमुक्तो युधि नागराजः कर्णेन रोषादसहंस्तस्य वाक्यम् ॥ ४९ ॥ स्वयं प्रायात् पार्थवधाय राजन् कृत्वा स्वरूपं विजिघांसुरुग्रः । राजन्! युद्धस्थलमें कर्णके द्वारा इस प्रकार टका-सा उत्तर पाकर वह नागराज रोषपूर्वक उसके इस वचनको सहन न कर सका। उस उग्र सर्पने अपने स्वरूपको प्रकट करके मनमें प्रतिहिंसाकी भावना लेकर पार्थके वधके लिये स्वयं ही उनपर आक्रमण किया ॥ ४९ १/२ ॥
ततः कृष्णः पार्थमुवाच संख्ये महोरगं कृतवैरं जहि त्वम् ॥ ५० ॥ स एवमुक्तो मधुसूदनेन गाण्डीवधन्वा रिपुवीर्यसाहः । उवाच को ह्येष ममाद्य नागः स्वयं स आयाद् गरुडस्य वक्त्रम् ॥ ५१ ॥ तब भगवान् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें अर्जुनसे कहा—'यह विशाल नाग तुम्हारा वैरी है। तुम इसे मार डालो'। भगवान् मधुसूदनके ऐसा कहनेपर शत्रुओंके बलका सामना करनेवाले गाण्डीवधारी अर्जुनने पूछा—'प्रभो! आज मेरे पास आनेवाला यह नाग कौन है? जो स्वयं ही गरुड़के मुखमें चला आया है' ॥ ५०-५१ ॥
कृष्ण उवाच
योऽसौ त्वया खाण्डवे चित्रभानुं संतर्पयाणेन धनुर्धरेण । वियद्गतो जननीगुप्तदेहो मत्वैकरूपं निहतास्य माता ॥ ५२ ॥ श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन! खाण्डव वनमें जब तुम हाथमें धनुष लेकर अग्निदेवको तृप्त कर रहे थे, उस समय यही सर्प अपनी माताके मुँहमें घुसकर अपने शरीरको सुरक्षित