महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2363, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरके आकाशमें उड़ा जा रहा था। तुमने उसे एक ही सर्प समझकर केवल इसकी माताका वध किया था ।। स एष तद् वैरमनुस्मरन् वै त्वां प्रार्थयत्यात्मवधाय नूनम् । नभश्च्युतां प्रज्वलितामिवोल्कां पश्यैनमायान्तममित्रसाह ।। ५३ ।। उसी वैरको याद करके यह अवश्य अपने वधके लिये ही तुमसे भिड़ना चाहता है। शत्रुसूदन! आकाशसे गिरती हुई प्रज्वलित उल्काके समान आते हुए इस सर्पको देखो ।।
संजय उवाच
ततः स जिष्णुः परिवृत्य रोषा- च्चिच्छेद षड्भिर्निशितैः सुधारैः । नागं वियत्तिर्यगिवोत्पतन्तं स छिन्नगात्रो निपपात भूमौ ।। ५४ ।। **संजय कहते हैं—**राजन्! तब अर्जुनने रोषपूर्वक घूमकर उत्तम धारवाले छः तीखे बाणोंद्वारा आकाशमें तिरछी गतिसे उड़ते हुए उस नागके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। शरीर टूक-टूक हो जानेके कारण वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ।।
हते च तस्मिन् भुजगे किरीटिना स्वयं विभुः पार्थिव भूतलादथ । समुज्जहाराशु पुनः पतन्तं रथं भुजाभ्यां पुरुषोत्तमस्ततः ।। ५५ ।। राजन्! किरीटधारी अर्जुनके द्वारा उस सर्पके मारे जानेपर स्वयं भगवान् पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने उस नीचे धँसते हुए रथको पुनः अपनी दोनों भुजाओंसे शीघ्र ही ऊपर उठा दिया ।।
तस्मिन् मुहूर्ते दशभिः पृषत्कैः शिलाशितैर्बर्हिणबर्हवाजितैः । विव्याध कर्णः पुरुषप्रवीरो धनंजयं तिर्यगवेक्षमाणः ।। ५६ ।। उस मुहूर्तमें नरवीर कर्णने धनंजयकी ओर तिरछी दृष्टिसे देखते हुए मयूरपंखसे युक्त, शिलापर तेज किये हुए, दस बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया ।। ५६ ।।
ततोऽर्जुनो द्वादशभिः सुमुक्तै- र्वराहकर्णैर्निशितैः समर्प्य । नाराचमाशीविषतुल्यवेग-