महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2364, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाकर्णपूर्णायतमुत्ससर्ज ।। ५७ ।।
तब अर्जुनने अच्छी तरह छोड़े हुए बारह बराहकर्ण नामक पैने बाणोंद्वारा कर्णको
घायल करके पुनः विषधर सर्पके तुल्य एक वेगशाली नाराचको कानतक खींचकर उसकी
ओर छोड़ दिया ।। ५७ ।।
स चित्रवर्मेषुवरो विदार्य
प्राणान्निरस्यन्निव साधुमुक्तः ।
कर्णस्य पीत्वा रुधिरं विवेश
वसुन्धरां शोणितदिग्धवाजः ।। ५८ ।।
भलीभाँति छूटे हुए उस उत्तम नाराचने कर्णके विचित्र कवचको चीर-फाड़कर उसके
प्राण निकालते हुए-से रक्तपान किया, फिर वह धरतीमें समा गया। उस समय उसके पंख
खूनसे लथपथ हो रहे थे ।। ५८ ।।
ततो वृषो बाणनिपातकोपितो
महोरगो दण्डविघट्टितो यथा ।
तदाशुकारी व्यसृजच्छरोत्तमान्
महाविषः सर्प इवोत्तमं विषम् ।। ५९ ।।
तब उस बाणके प्रहारसे क्रोधमें भरे हुए शीघ्रकारी कर्णने लाठीकी चोट खाये हुए
महान् सर्पके समान तिलमिलाकर उसी प्रकार उत्तम बाणोंका प्रहार आरम्भ किया, जैसे
महाविषैला सर्प अपने उत्तम विषका वमन करता है ।।
जनार्दनं द्वादशभिः पराभिन-
न्नैवर्नवत्या च शरैस्तथार्जुनम् ।
शरेण घोरेण पुनश्च पाण्डवं
विदार्य कर्णो व्यनदज्जहास च ।। ६० ।।
उसने बारह बाणोंसे श्रीकृष्णको और निन्यानबे बाणोंसे अर्जुनको अच्छी तरह घायल
किया। तत्पश्चात् एक भयंकर बाणसे पाण्डुपुत्र अर्जुनको पुनः क्षत-विक्षत करके कर्ण
सिंहके समान दहाड़ने और हँसने लगा ।। ६० ।।
तमस्य हर्षं ममृषे न पाण्डवो
बिभेद मर्माणि ततोऽस्य मर्मवित् ।
परःशतैः पत्रिभिरिन्द्रविक्रम-
स्तथा यथेन्द्रो बलमोजसा रणे ।। ६१ ।।
उसके उस हर्षको पाण्डुपुत्र अर्जुन सहन न कर सके। वे उसके मर्मस्थलोंको जानते थे
और इन्द्रके समान पराक्रमी थे। अतः जैसे इन्द्रने रणभूमिमें बलासुरको बलपूर्वक आहत
किया था, उसी प्रकार अर्जुनने सौसे भी अधिक बाणोंद्वारा कर्णके मर्मस्थानोंको विदीर्ण
कर दिया ।। ६१ ।।