भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2366, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2366

अर्जुनने उतावले होकर क्रिया, प्रयत्न और बलपूर्वक छोड़े गये तथा विशाल धनुर्मण्डलसे छूटे हुए बहुसंख्यक पैने और उत्तम बाणोंद्वारा कर्णके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचाकर उसे विदीर्ण कर दिया ॥ ६६ ॥ दृढाहतः पत्रिभिरुग्रवेगैः पार्थेन कर्णो विविधैः शिताग्रैः । बभौ गिरिर्गैरिकधातुरक्तः क्षरन् प्रपातैरिव रक्तमम्भः ॥ ६७ ॥ अर्जुनके भयंकर वेगशाली और तेजधारवाले नाना प्रकारके बाणोंद्वारा गहरी चोट खाकर कर्ण अपने अंगोंसे रक्तकी धारा बहाता हुआ उस पर्वतके समान सुशोभित हुआ, जो गेरू आदि धातुओंसे रँगा होनेके कारण अपने झरनोंसे लाल पानी बहाया करता है ॥ ६७ ॥ ततोऽर्जुनः कर्णमवक्रगैर्नवैः सुवर्णपुङ्खैः सुदृढैरयस्मयैः । यमाग्निदण्डप्रतिमैः स्तनान्तरे पराभिनत् क्रौञ्चमिवाद्रिमग्निजः ॥ ६८ ॥ तत्पश्चात् अर्जुनने सोनेके पंखवाले लोहनिर्मित, सुदृढ़ तथा यमदण्ड और अग्निदण्डके तुल्य भयंकर बाणोंद्वारा कर्णकी छातीको उसी प्रकार विदीर्ण कर डाला, जैसे कुमार कार्तिकेयने क्रौंच पर्वतको चीर डाला था ॥ ६८ ॥ ततः शरावापमपास्य सूतजो धनुश्च तच्छक्रशरासनोपमम् । ततो रथस्थः स मुमोह च स्खलन् प्रशीर्णमुष्टिः सुभृशाहतः प्रभो ॥ ६९ ॥ प्रभो! अत्यन्त आहत हो जानेके कारण सूतपुत्र कर्ण तरकस और इन्द्रधनुषके समान अपना धनुष छोड़कर रथपर ही लड़खड़ाता हुआ मूर्च्छित हो गया। उस समय उसकी मुट्ठी ढीली हो गयी थी ॥ ६९ ॥ न चार्जुनस्तं व्यसने तदेषिवा- न्निहन्तुमार्यः पुरुषव्रते स्थितः । ततस्तमिन्द्रावरजः सुसम्भ्रमा- दुवाच किं पाण्डव हे प्रमाद्यसे ॥ ७० ॥ राजन्! अर्जुन सत्पुरुषोंके व्रतमें स्थित रहनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य हैं; अतः उन्होंने उस संकटके समय कर्णको मारनेकी इच्छा नहीं की। तब इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीकृष्णने बड़े वेगसे कहा—‘पाण्डुनन्दन! तुम लापरवाही क्यों दिखाते हो? ॥ ७० ॥ नैवाहितानां सततं विपश्चितः

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