भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2367

क्षणं प्रतीक्षन्त्यपि दुर्बलीयसाम् ।
विशेषतोऽरीन् व्यसनेषु पण्डितो
निहत्य धर्मं च यशश्च विन्दते ॥ ७१ ॥
‘विद्वान् पुरुष कभी दुर्बल-से-दुर्बल शत्रुओंको भी नष्ट करनेके लिये किसी अवसरकी प्रतीक्षा नहीं करते। विशेषतः संकटमें पड़े हुए शत्रुओंको मारकर बुद्धिमान् पुरुष धर्म और यशका भागी होता है ॥ ७१ ॥

तदेकवीरं तव चाहितं सदा
त्वरस्व कर्णं सहसाभिमर्दितुम् ।
पुरा समर्थः समुपैति सूतजो
भिन्धि त्वमेनं नमुचिं यथा हरिः ॥ ७२ ॥
‘इसलिये सदा तुमसे शत्रुता रखनेवाले इस अद्वितीय वीर कर्णको सहसा कुचल डालनेके लिये तुम शीघ्रता करो। सूतपुत्र कर्ण शक्तिशाली होकर आक्रमण करे, इसके पहले ही तुम इसे उसी प्रकार मार डालो, जैसे इन्द्रने नमुचिका वध किया था’ ॥ ७२ ॥

ततस्तदेवेत्यभिपूज्य सत्वरं
जनार्दनं कर्णमविध्यदर्जुनः ।
शरोत्तमैः सर्वकुरूत्तमस्त्वरं-
स्तथा यथा शम्बरहा पुरा बलिम् ॥ ७३ ॥
‘अच्छा, ऐसा ही होगा’ यों कहकर श्रीकृष्णका समादर करते हुए सम्पूर्ण कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष अर्जुन उत्तम बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक कर्णको उसी प्रकार बींधने लगे, जैसे पूर्वकालमें शम्बर-शत्रु इन्द्रने राजा बलिपर प्रहार किया था ॥ ७३ ॥

साश्वं तु कर्णं सरथं किरीटी
समाचिनोद् भारत वत्सदन्तैः ।
प्रच्छादयामास दिशश्च बाणैः
सर्वप्रयत्नात्तपनीयपुङ्खैः ॥ ७४ ॥
भरतनन्दन! किरीटधारी अर्जुनने घोड़ों और रथसहित कर्णके शरीरको वत्सदन्त नामक बाणोंसे भर दिया। फिर सारी शक्ति लगाकर सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ७४ ॥

स वत्सदन्तैः पृथूपीनवक्षाः
समाचितः सोऽधिरथिर्विभाति ।
सुपुष्पिताशोकपलाशशाल्मलि-
र्यथाचलश्चन्दनकाननायुतः ॥ ७५ ॥
चौड़े और मोटे वक्षःस्थलवाले अधिरथपुत्र कर्णका शरीर वत्सदन्तनामक बाणोंसे व्याप्त होकर खिले हुए अशोक, पलाश, सेमल और चन्दनवनसे युक्त पर्वतके समान