भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2368

सुशोभित होने लगा ।। ७५ ।। शरैः शरीरे बहुभिः समर्पितै- विभाति कर्णः समरे विशाम्पते । महीरुहैराचितसानुकन्दरो यथा गिरीन्द्रः स्फुटकर्णिकारवान् ।। ७६ ।। प्रजानाथ! कर्णके शरीरमें बहुत-से बाण धँस गये थे। उनके द्वारा समरांगणमें उसकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे वृक्षोंसे व्याप्त शिखर और कन्दरावाले गिरिराजके ऊपर लाल कनेरके फूल खिलनेसे उसकी शोभा होती है ।। स बाणसङ्घान् बहुधा व्यवासृजद् विभाति कर्णः शरजालरश्मिवान् । सलोहितो रक्तगभस्तिमण्डलो दिवाकरोऽस्ताभिमुखो यथा तथा ।। ७७ ।। तदनन्तर कर्ण (सावधान होकर) शत्रुओंपर बहुत-से बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा। उस समय जैसे अस्ताचलकी ओर जाते हुए सूर्यमण्डल और उसकी किरणें लाल हो जाती हैं, उसी प्रकार खूनसे लाल हुआ वह शरसमूहरूपी किरणोंसे सुशोभित हो रहा था ।। बाह्वन्तरादाधिरथेर्विमुक्तान् बाणान् महाहीनिव दीप्यमानान् । व्यध्वंसयन्नर्जुनबाहुमुक्ताः शराः समासाद्य दिशः शिताग्राः ।। ७८ ।। कर्णकी भुजाओंसे छूटकर बड़े-बड़े सर्पोंके समान प्रकाशित होनेवाले बाणोंको अर्जुनके हाथोंसे छूटे हुए तीखे बाणोंने सम्पूर्ण दिशाओंमें फैलकर नष्ट कर दिया ।। ततः स कर्णः समवाप्य धैर्यं बाणान् विमुञ्चन् कुपिताहिकल्पान् । विव्याध पार्थं दशभिः पृषत्कैः कृष्णं च षड्भिः कुपिताहिकल्पैः ।। ७९ ।। तदनन्तर कर्ण धैर्य धारण करके कुपित सर्पोंके समान भयंकर बाण छोड़ने लगा। उसने क्रोधमें भरे हुए भुजंगमोंके सदृश दस बाणोंसे अर्जुनको और छःसे श्रीकृष्णको भी घायल कर दिया ।। ७९ ।। ततः किरीटी भृशमुग्रनिःस्वनं महाशरं सर्पविषानलोपमम् । अयस्मयं रौद्रमहास्त्रसम्भृतं महाहवे क्षेप्तुमना महामतिः ।। ८० ।।