महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सुशोभित होने लगा ।। ७५ ।। शरैः शरीरे बहुभिः समर्पितै- विभाति कर्णः समरे विशाम्पते । महीरुहैराचितसानुकन्दरो यथा गिरीन्द्रः स्फुटकर्णिकारवान् ।। ७६ ।। प्रजानाथ! कर्णके शरीरमें बहुत-से बाण धँस गये थे। उनके द्वारा समरांगणमें उसकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे वृक्षोंसे व्याप्त शिखर और कन्दरावाले गिरिराजके ऊपर लाल कनेरके फूल खिलनेसे उसकी शोभा होती है ।। स बाणसङ्घान् बहुधा व्यवासृजद् विभाति कर्णः शरजालरश्मिवान् । सलोहितो रक्तगभस्तिमण्डलो दिवाकरोऽस्ताभिमुखो यथा तथा ।। ७७ ।। तदनन्तर कर्ण (सावधान होकर) शत्रुओंपर बहुत-से बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा। उस समय जैसे अस्ताचलकी ओर जाते हुए सूर्यमण्डल और उसकी किरणें लाल हो जाती हैं, उसी प्रकार खूनसे लाल हुआ वह शरसमूहरूपी किरणोंसे सुशोभित हो रहा था ।। बाह्वन्तरादाधिरथेर्विमुक्तान् बाणान् महाहीनिव दीप्यमानान् । व्यध्वंसयन्नर्जुनबाहुमुक्ताः शराः समासाद्य दिशः शिताग्राः ।। ७८ ।। कर्णकी भुजाओंसे छूटकर बड़े-बड़े सर्पोंके समान प्रकाशित होनेवाले बाणोंको अर्जुनके हाथोंसे छूटे हुए तीखे बाणोंने सम्पूर्ण दिशाओंमें फैलकर नष्ट कर दिया ।। ततः स कर्णः समवाप्य धैर्यं बाणान् विमुञ्चन् कुपिताहिकल्पान् । विव्याध पार्थं दशभिः पृषत्कैः कृष्णं च षड्भिः कुपिताहिकल्पैः ।। ७९ ।। तदनन्तर कर्ण धैर्य धारण करके कुपित सर्पोंके समान भयंकर बाण छोड़ने लगा। उसने क्रोधमें भरे हुए भुजंगमोंके सदृश दस बाणोंसे अर्जुनको और छःसे श्रीकृष्णको भी घायल कर दिया ।। ७९ ।। ततः किरीटी भृशमुग्रनिःस्वनं महाशरं सर्पविषानलोपमम् । अयस्मयं रौद्रमहास्त्रसम्भृतं महाहवे क्षेप्तुमना महामतिः ।। ८० ।।
तब परम बुद्धिमान् किरीटधारी अर्जुनने उस महासमरमें कर्णपर भयानक शब्द करनेवाले, सर्पविष और अग्निके समान तेजस्वी लोहनिर्मित तथा महारौद्रास्त्रसे अभिमन्त्रित विशाल बाण छोड़नेका विचार किया॥ ८० ॥
कालो ह्यदृश्यो नृप विप्रकोपा-
न्निदर्शयन् कर्णवधं ब्रुवाणः।
भूमिस्तु चक्रं ग्रसतीत्यवोचत्-
कर्णस्य तस्मिन् वधकाल आगते॥ ८१ ॥
नरेश्वर! उस समय काल अदृश्य रहकर ब्राह्मणके क्रोधसे कर्णके वधकी सूचना देता हुआ उसकी मृत्युका समय उपस्थित होनेपर इस प्रकार बोला—‘अब भूमि तुम्हारे पहियेको निगलना ही चाहती है’॥ ८१ ॥
ततस्तदस्त्रं मनसः प्रणष्टं
यद् भार्गवोऽस्मै प्रददौ महात्मा।
चक्रं च वामं ग्रसते भूमिरस्य
प्राप्ते तस्मिन् वधकाले नृवीर॥ ८२ ॥
नरवीर! अब कर्णके वधका समय आ पहुँचा था। महात्मा परशुरामने कर्णको जो भार्गवास्त्र प्रदान किया था, वह उस समय उसके मनसे निकल गया—उसे उसकी याद न रह सकी। साथ ही, पृथ्वी उसके रथके बायें पहियेको निगलने लगी॥ ८२ ॥
ततो रथो घूर्णितवान् नरेन्द्र
शापात्तदा ब्राह्मणसत्तमस्य।
ततश्चक्रमपतत्तस्य भूमौ
स विह्वलः समरे सूतपुत्रः॥ ८३ ॥
नरेन्द्र! श्रेष्ठ ब्राह्मणके शापसे उस समय उसका रथ डगमगाने लगा और उसका पहिया पृथ्वीमें धँस गया। यह देख सूतपुत्र कर्ण समरांगणमें व्याकुल हो उठा॥ ८३ ॥
सवेदिकश्चैत्य इवातिमात्रः
सुपुष्पितो भूमितले निमग्नः।
घूर्णे रथे ब्राह्मणस्याभिशापाद्
रामादुपात्ते त्वविभाति चास्त्रे॥ ८४ ॥
छिन्ने शरे सर्पमुखे च घोरे
पार्थेन तस्मिन् विषसाद कर्णः।
अमृष्यमाणो व्यसनानि तानि
हस्तौ विधुन्वन् स विगर्हमाणः॥ ८५ ॥
जैसे सुन्दर पुष्पोंसे युक्त विशाल चैत्यवृक्ष वेदीसहित पृथ्वीमें धँस जाय, वही दशा उस रथकी भी हुई। ब्राह्मणके शापसे जब रथ डगमग करने लगा, परशुरामजीसे प्राप्त हुआ
अस्त्र भूल गया और घोर सर्पमुख बाण अर्जुनके द्वारा काट डाला गया, तब उस अवस्थामें
उन संकटोंको सहन न कर सकनेके कारण कर्ण खिन्न हो उठा और दोनों हाथ हिला-
हिलाकर धर्मकी निन्दा करने लगा ।। ८४-८५ ।।
धर्मप्रधानं किल पाति धर्म
इत्यब्रुवन् धर्मविदः सदैव ।
वयं च धर्मे प्रयताम नित्यं
चर्तुं यथाशक्ति यथाश्रुतं च ।
स चापि निघ्नाति न पाति भक्तान्
मन्ये न नित्यं परिपाति धर्मः ।। ८६ ।।
‘धर्मज्ञ पुरुषोंने सदा ही यह बात कही है कि ‘धर्मपरायण पुरुषकी धर्म सदा रक्षा
करता है। हम अपनी शक्ति और ज्ञानके अनुसार सदा धर्मपालनके लिये प्रयत्न करते रहते
हैं, किंतु वह भी हमें मारता ही है, भक्तोंकी रक्षा नहीं करता; अतः मैं समझता हूँ, धर्म सदा
किसकी रक्षा नहीं करता' ।। ८६ ।।
एवं ब्रुवन् प्रस्खलिताश्वसूतो
विचाल्यमानोऽर्जुनबाणपातैः ।
मर्माभिघाताच्छिथिलः क्रियासु
पुनः पुनर्धर्ममसौ जगर्ह ।। ८७ ।।
ऐसा कहता हुआ कर्ण जब अर्जुनके बाणोंकी मारसे विचलित हो उठा, उसके घोड़े
और सारथि लड़खड़ाकर गिरने लगे और मर्मपर आघात होनेसे वह कार्य करनेमें शिथिल
हो गया तब बारंबार धर्मकी ही निन्दा करने लगा ।। ८७ ।।
ततः शरैर्भीमतरैरविध्यत् त्रिभिराहवे ।
हस्ते कृष्णं तथा पार्थमभ्यविध्यच्च सप्तभिः ।। ८८ ।।
तदनन्तर उसने तीन भयानक बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें श्रीकृष्णके हाथमें चोट पहुँचायी
और अर्जुनको भी सात बाणोंसे बींध डाला ।। ८८ ।।
ततोऽर्जुनः सप्तदश तिग्मवेगानजिह्मगान् ।
इन्द्राशनिसमान् घोरानसृजत् पावकोपमान् ।। ८९ ।।
तत्पश्चात् अर्जुनने इन्द्रके वज्र तथा अग्निके समान प्रचण्ड वेगशाली सत्रह घोर बाण
कर्णपर छोड़े ।। ८९ ।।
निर्भिद्य ते भीमवेगा ह्यपतन् पृथिवीतले ।
कम्पितात्मा ततः कर्णः शक्त्या चेष्टामदर्शयत् ।। ९० ।।
वे भयानक वेगशाली बाण कर्णको घायल करके पृथ्वीपर गिर पड़े। इससे कर्ण काँप
उठा। फिर भी यथाशक्ति युद्धकी चेष्टा दिखाता रहा ।। ९० ।।
बलेनाथ स संस्तभ्य ब्रह्मास्त्रं समुदैरयत् ।
ऐन्द्रं ततोऽर्जुनश्चापि तं दृष्ट्वाभ्युपमन्त्रयत् ॥ ९१ ॥ उसने बलपूर्वक धैर्य धारण करके ब्रह्मास्त्र प्रकट किया। यह देख अर्जुनने भी ऐन्द्रास्त्रको अभिमन्त्रित किया ।। ९१ ।।
गाण्डीवं ज्यां च बाणांश्च सोऽनुमन्त्र्य परंतपः । व्यसृजच्छरवर्षाणि वर्षाणीव पुरन्दरः ॥ ९२ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने गाण्डीव धनुष, प्रत्यंचा और बाणोंको भी अभिमन्त्रित करके वहाँ शरसमूहोंकी उसी प्रकार वर्षा आरम्भ कर दी, जैसे इन्द्र जलकी वृष्टि करते हैं ।। ९२ ।।
ततस्तेजोमया बाणा रथात् पार्थस्य निःसृताः । प्रादुरासन् महावीर्याः कर्णस्य रथमन्तिकात् ॥ ९३ ॥ तदनन्तर कुन्तीकुमार अर्जुनके रथसे महान् शक्तिशाली और तेजस्वी बाण निकलकर कर्णके रथके समीप प्रकट होने लगे ।। ९३ ।।
तान् कर्णस्त्वग्रतो न्यस्तान् मोघांश्चक्रे महारथः । ततोऽब्रवीद् वृष्णिवीरस्तस्मिन्नस्त्रे विनाशिते ॥ ९४ ॥ महारथी कर्णने अपने सामने आये हुए उन सभी बाणोंको व्यर्थ कर दिया। उस अस्त्रके नष्ट कर दिये जानेपर वृष्णिवंशी वीर भगवान् श्रीकृष्णने कहा— ।। ९४ ।।
विसृजास्त्रं परं पार्थ राधेयो ग्रसते शरान् । ततो ब्रह्मास्त्रमत्युग्रं सम्मन्त्र्य समयोजयत् ॥ ९५ ॥ ‘पार्थ! दूसरा कोई उत्तम अस्त्र छोड़ो। राधापुत्र कर्ण तुम्हारे बाणोंको नष्ट करता जा रहा है।' तब अर्जुनने अत्यन्त भयंकर ब्रह्मास्त्रको अभिमन्त्रित करके धनुषपर रखा ।।
छादयित्वा ततो बाणैः कर्णं प्रत्यस्यदर्जुनः । ततः कर्णः शितैर्बाणैर्ज्यां चिच्छेद सुतेजनैः ॥ ९६ ॥ और उसके द्वारा बाणोंकी वर्षा करके अर्जुनने कर्णको आच्छादित कर दिया। इसके बाद भी वे लगातार बाणोंका प्रहार करते रहे। तब कर्णने तेज किये हुए पैने बाणोंसे अर्जुनके धनुषकी डोरी काट डाली ।।
द्वितीयां च तृतीयां च चतुर्थीं पञ्चमीं तथा । षष्ठीमथास्य चिच्छेद सप्तमीं च तथाष्टमीम् ॥ ९७ ॥ उसने क्रमशः दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं और आठवीं डोरी भी काट दी ।। ९७ ।।
नवमीं दशमीं चास्य तथा चैकादशीं वृषः । ज्याशतं शतसंधानः स कर्णो नावबुध्यते ॥ ९८ ॥ इतना ही नहीं, नवीं, दसवीं और ग्यारहवीं डोरी काटकर भी सौ बाणोंका संधान करनेवाले कर्णको यह पता नहीं चला कि अर्जुनके धनुषमें सौ डोरियाँ लगी हैं ।। ९८ ।।
ततो ज्यां विनिधायान्यामभिमन्त्र्य च पाण्डवः ।
शरैरवाकिरत् कर्णं दीप्यमानैरिवाहिभिः ॥ ९९ ॥
तदनन्तर दूसरी डोरी चढ़ाकर पाण्डुकुमार अर्जुनने उसे भी अभिमन्त्रित किया और प्रज्वलित सर्पोंके समान बाणोंद्वारा कर्णको आच्छादित कर दिया ॥ ९९ ॥
तस्य ज्याछेदनं कर्णो ज्यावधानं च संयुगे ।
नान्वबुध्यत शीघ्रत्वात्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १०० ॥
युद्धस्थलमें अर्जुनके धनुषकी डोरी काटना और पुनः दूसरी डोरीका चढ़ जाना इतनी शीघ्रतासे होता था कि कर्णको भी उसका पता नहीं चलता था। वह एक अद्भुत-सी घटना थी ॥ १०० ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य प्रनिघ्नन् सव्यसाचिनः ।
चक्रे चाप्यधिकं पार्थात् स्ववीर्यमतिदर्शयन् ॥ १०१ ॥
कर्ण अपने अस्त्रोंद्वारा सव्यसाची अर्जुनके अस्त्रोंका निवारण करके उन सबको नष्ट कर दिया और अपने पराक्रमका प्रदर्शन करते हुए उसने अपने-आपको अर्जुनसे अधिक शक्तिशाली सिद्ध कर दिखाया ॥ १०१ ॥
ततः कृष्णोऽर्जुनं दृष्ट्वा कर्णास्त्रेण च पीडितम् ।
अभ्यसेत्यब्रवीत् पार्थमातिष्ठास्त्रं व्रजेति च ॥ १०२ ॥
तब श्रीकृष्णने अर्जुनको कर्णके अस्त्रसे पीड़ित हुआ देखकर कहा—'पार्थ! लगातार अस्त्र छोड़ो। उत्तम अस्त्रोंका प्रयोग करो और आगे बढ़े चलो' ॥ १०२ ॥
ततोऽग्निसदृशं घोरं शरं सर्पविषोपमम् ।
अश्मसारमयं दिव्यमभिमन्त्र्य परंतपः ॥ १०३ ॥
रौद्रमस्त्रं समाधाय क्षेप्तुकामं किरीटवान् ।
ततोऽग्रसन्मही चक्रं राधेयस्य तदा नृप ॥ १०४ ॥
तब शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने अग्नि और सर्पविषके समान भयंकर लोहमय दिव्य बाणको अभिमन्त्रित करके उसमें रौद्रास्त्रका आधान किया और उसे कर्णपर छोड़नेका विचार किया। नरेश्वर! इतनेहीमें पृथ्वीने राधापुत्र कर्णके पहियेको ग्रस लिया ॥ १०३-१०४ ॥
ततोऽवतीर्य राधेयो रथादाशु समुद्यतः ।
चक्रं भुजाभ्यामालम्ब्य समुत्क्षेप्तुमियेष सः ॥ १०५ ॥
यह देख राधापुत्र कर्ण शीघ्र ही रथसे उतर पड़ा और उद्योगपूर्वक अपनी दोनों भुजाओंसे पहियेको थामकर उसे ऊपर उठानेका विचार किया ॥ १०५ ॥
सप्तद्वीपा वसुमती सशैलवनकानना ।
जीर्णचक्रा समुत्क्षिप्ता कर्णेन चतुरङ्गुलम् ॥ १०६ ॥
कर्णने उस रथको ऊपर उठाते समय ऐसा झटका दिया कि सात द्वीपोंसे युक्त, पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी चक्रको निगले हुए ही चार अंगुल ऊपर उठ आयी ॥ १०६ ॥
ग्रस्तचक्रस्तु राधेयः क्रोधादश्रूण्यवर्तयत् ।
अर्जुनं वीक्ष्य संरब्धमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १०७ ॥
पहिया फँस जानेके कारण राधापुत्र कर्ण क्रोधसे आँसू बहाने लगा और रोषावेशसे युक्त अर्जुनकी ओर देखकर इस प्रकार बोला— ॥ १०७ ॥
भो भोः पार्थ महेष्वास मुहूर्तं परिपालय ।
यावच्चक्रमिदं ग्रस्तमुद्धरामि महीतलात् ॥ १०८ ॥
'महाधनुर्धर कुन्तीकुमार! दो घड़ी प्रतीक्षा करो, जिससे मैं इस फँसे हुए पहियेको पृथ्वीतलसे निकाल लूँ ॥ १०८ ॥
सव्यं चक्रं महीग्रस्तं दृष्ट्वा दैवादिदं मम ।
पार्थ कापुरुषाचीर्णमभिसंधिं विसर्जय ॥ १०९ ॥
'पार्थ! दैवयोगसे मेरे इस बायें पहियेको धरतीमें फँसा हुआ देखकर तुम कापुरुषोचित कपटपूर्ण बर्तावका परित्याग करो ॥ १०९ ॥
न त्वं कापुरुषाचीर्णं मार्गमास्थातुमर्हसि ।
ख्यातस्त्वमसि कौन्तेय विशिष्टो रणकर्मसु ॥ ११० ॥
विशिष्टतरमेव त्वं कर्तुमर्हसि पाण्डव ।
'कुन्तीनन्दन! जिस मार्गपर कायर चला करते हैं, उसीपर तुम भी न चलो; क्योंकि तुम युद्धकर्ममें विशिष्ट वीरके रूपमें विख्यात हो। पाण्डुनन्दन! तुम्हें तो अपने-आपको और भी विशिष्ट ही सिद्ध करना चाहिये ॥ ११० ½ ॥
प्रकीर्णकेशे विमुखे ब्राह्मणेऽथ कृताञ्जलौ ॥ १११ ॥
शरणागते न्यस्तशस्त्रे याचमाने तथाऽर्जुन ।
अबाणे भ्रष्टकवचे भ्रष्टभग्नायुधे तथा ॥ ११२ ॥
न विमुञ्चन्ति शस्त्राणि शूराः साधुव्रते स्थिताः ।
'अर्जुन! जो केश खोलकर खड़ा हो, युद्धसे मुँह मोड़ चुका हो, ब्राह्मण हो, हाथ जोड़कर शरणमें आया हो, हथियार डाल चुका हो, प्राणोंकी भीख माँगता हो, जिसके बाण, कवच और दूसरे-दूसरे आयुध नष्ट हो गये हों, ऐसे पुरुषपर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शूरवीर शस्त्रोंका प्रहार नहीं करते ॥ १११-११२ ½ ॥
त्वं च शूरतमो लोके साधुवृत्तश्च पाण्डव ॥ ११३ ॥
अभिज्ञो युद्धधर्माणां वेदान्तावभृथाप्लुतः ।
दिव्यास्त्रविदमेयात्मा कार्तवीर्यसमो युधि ॥ ११४ ॥
‘पाण्डुनन्दन! तुम लोकमें महान् शूर और सदाचारी माने जाते हो। युद्धके धर्मोंको जानते हो। वेदान्तका अध्ययनरूपी यज्ञ समाप्त करके तुम उसमें अवभृथस्नान कर चुके हो। तुम्हें दिव्यास्त्रोंका ज्ञान है। तुम अमेय आत्मबलसे सम्पन्न तथा युद्धस्थलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी हो।। ११३-११४।। यावच्चक्रमिदं ग्रस्तमुद्धरामि महाभुज। न मां रथस्थो भूमिष्ठं विकलं हन्तुमर्हसि।। ११५।। ‘महाबाहो! जबतक मैं इस फँसे हुए पहियेको निकाल रहा हूँ, तबतक तुम रथारूढ़ होकर भी मुझ भूमिपर खड़े हुएको बाणोंकी मारसे व्याकुल न करो।। न वासुदेवात् त्वत्तो वा पाण्डवेय बिभेम्यहम्। त्वं हि क्षत्रियदायादो महाकुलविवर्धनः। अतस्त्वां प्रब्रवीम्येष मुहूर्तं क्षम पाण्डव।। ११६।। ‘पाण्डुपुत्र! मैं वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण अथवा तुमसे तनिक भी डरता नहीं हूँ। तुम क्षत्रियके पुत्र हो, एक उच्च कुलका गौरव बढ़ाते हो; इसलिये तुमसे ऐसी बात कहता हूँ। पाण्डव! तुम दो घड़ीके लिये मुझे क्षमा करो’।। ११६।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णरथचक्रग्रसने नवतितमोऽध्यायः।। ९०।। इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णके रथके पहियेका पृथ्वीमें फँसना—इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ।। ९०।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ११८ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2375)
कर्णद्वारा पृथ्वीमें धँसे हुए पहियेको उठानेका प्रयत्न
अध्याय (पृष्ठ 2376)
एकनवतितमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका कर्णको चेतावनी देना और कर्णका वध
संजय उवाच
तमब्रवीद् वासुदेवो रथस्थो
राधेय दिष्ट्या स्मरसीह धर्मम् ।
प्रायेण नीचा व्यसनेषु मग्ना
निन्दन्ति दैवं कुकृतं न तु स्वम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! उस समय रथपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने कर्णसे कहा—'राधानन्दन! सौभाग्यकी बात है कि अब यहाँ तुम्हें धर्मकी याद आ रही है! प्रायः यह देखनेमें आता है कि नीच मनुष्य विपत्तिमें पड़नेपर दैवकी ही निन्दा करते हैं। अपने किये हुए कुकर्मोंकी नहीं ॥ १ ॥
यद् द्रौपदीमेकवस्त्रां सभाया-
मानाययेस्त्वं च सुयोधनश्च ।
दुःशासनः शकुनिः सौबलश्च
न ते कर्ण प्रत्यभात्तत्र धर्मः ॥ २ ॥
'कर्ण! जब तुमने तथा दुर्योधन, दुःशासन और सुबलपुत्र शकुनिने एक वस्त्र धारण करनेवाली रजस्वला द्रौपदीको सभामें बुलवाया था, उस समय तुम्हारे मनमें धर्मका विचार नहीं उठा था? ॥ २ ॥
यदा सभायां राजानमनक्षज्ञं युधिष्ठिरम् ।
अजैषीच्छकुनिर्ज्ञानात् क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ३ ॥
'जब कौरवसभामें जूएके खेलका ज्ञान न रखनेवाले राजा युधिष्ठिरको शकुनिने जान-बूझकर छलपूर्वक हराया था, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ॥ ३ ॥
वनवासे व्यतीते च कर्ण वर्षे त्रयोदशे ।
न प्रयच्छसि यद् राज्यं क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ४ ॥
'कर्ण! वनवासका तेरहवाँ वर्ष बीत जानेपर भी जब तुमने पाण्डवोंका राज्य उन्हें वापस नहीं दिया था, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ॥ ४ ॥
यद् भीमसेनं सर्पैश्च विषयुक्तैश्च भोजनैः ।
आचरत् त्वन्मते राजा क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ५ ॥
'जब राजा दुर्योधनने तुम्हारी ही सलाह लेकर भीमसेनको जहर मिलाया हुआ अन्न खिलाया और उन्हें सर्पोंसे डँसवाया, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ गया था? ।।
यद् वारणावते पार्थान् सुप्ताञ्जतुगृहे तदा ।
आदीपयस्त्वं राधेय क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ६ ॥
'राधानन्दन! उन दिनों वारणावतनगरमें लाक्षाभवनके भीतर सोये हुए कुन्तीकुमारोंको जब तुमने जलानेका प्रयत्न कराया था, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ गया था? ।। ६ ।।
यदा रजस्वलां कृष्णां दुःशासनवशे स्थिताम् ।
सभायां प्राहसः कर्ण क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ७ ॥
'कर्ण! भरी सभामें दुःशासनके वशमें पड़ी हुई रजस्वला द्रौपदीको लक्ष्य करके जब तुमने उपहास किया था, तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ।। ७ ।।
यदनायैः पुरा कृष्णां क्लिश्यमानामनागसम् ।
उपप्रेक्षसि राधेय क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ८ ॥
'राधानन्दन! पहले नीच कौरवोंद्वारा क्लेश पाती हुई निरपराध द्रौपदीको जब तुम निकटसे देख रहे थे, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ गया था? ।। ८ ।।
विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः ।
पतिमन्यं वृणीष्वेति वदंस्त्वं गजगामिनीम् ॥ ९ ॥
उपप्रेक्षसि राधेय क्व ते धर्मस्तदा गतः ।
'(याद है न, तुमने द्रौपदीसे कहा था) 'कृष्णे! पाण्डव नष्ट हो गये, सदाके लिये नरकमें पड़ गये। अब तू किसी दूसरे पतिका वरण कर ले। जब तुम ऐसी बात कहते हुए गजगामिनी द्रौपदीको निकटसे आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ।। ९ १/२ ।।
राज्यलुब्धः पुनः कर्ण समाव्यथसि पाण्डवान् ।
यदा शकुनिमाश्रित्य क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ १० ॥
'कर्ण! फिर राज्यके लोभमें पड़कर तुमने शकुनिकी सलाहके अनुसार जब पाण्डवोंको दोबारा जूएके लिये बुलवाया, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ।।
यदाभिमन्युं बहवो युद्धे जघ्नुर्महारथाः ।
परिवार्य रणे बालं क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ११ ॥
'जब युद्धमें तुम बहुत-से महारथियोंने मिलकर बालक अभिमन्युको चारों ओरसे घेरकर मार डाला था, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ।। ११ ।।
यद्येष धर्मस्तत्र न विद्यते हि
किं सर्वथा तालुविशोषणेन ।
अद्येह धर्म्याणि विधत्स्व सूत
तथापि जीवन्न विमोक्ष्यसे हि ॥ १२ ॥
'यदि उन अवसरोंपर यह धर्म नहीं था तो आज भी यहाँ सर्वथा धर्मकी दुहाई देकर तालु सुखानेसे क्या लाभ? सूत! अब यहाँ धर्मके कितने ही कार्य क्यों न कर डालो, तथापि जीते-जी तुम्हारा छुटकारा नहीं हो सकता ॥ १२ ॥ नलो ह्यक्षैर्निर्जितः पुष्करेण पुनर्यशो राज्यमवाप वीर्यात् । प्राप्तास्तथा पाण्डवा बाहुवीर्यात् सर्वैः समेताः परिवृत्तलोभाः ॥ १३ ॥ निहत्य शत्रून् समरे प्रवृद्धान् ससोमका राज्यमवाप्नुयुस्ते । तथा गता धार्तराष्ट्रा विनाशं धर्माभिगुप्तैः सततं नृसिंहैः ॥ १४ ॥ 'पुष्करने राजा नलको जूएमें जीत लिया था; किंतु उन्होंने अपने ही पराक्रमसे पुनः अपने राज्य और यश दोनोंको प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार लोभशून्य पाण्डव भी अपनी भुजाओंके बलसे सम्पूर्ण सगे-सम्बन्धियोंके साथ रहकर समरांगणमें बढ़े-चढ़े शत्रुओंका संहार करके फिर अपना राज्य प्राप्त करेंगे। निश्चय ही ये सोमकोंके साथ अपने राज्यपर अधिकार कर लेंगे। पुरुषसिंह पाण्डव सदैव अपने धर्मसे सुरक्षित हैं; अतः इनके द्वारा अवश्य धृतराष्ट्रके पुत्रोंका नाश हो जायगा' ॥ १३-१४ ॥
संजय उवाच
एवमुक्तस्तदा कर्णो वासुदेवेन भारत । लज्जयावनतो भूत्वा नोत्तरं किञ्चिदुक्तवान् ॥ १५ ॥ **संजय कहते हैं—**भारत! उस समय भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कर्णने लज्जासे अपना सिर झुका लिया, उससे कुछ भी उत्तर देते नहीं बना ॥ १५ ॥ क्रोधात् प्रस्फुरमाणौष्ठो धनुरुद्यम्य भारत । योधयामास वै पार्थं महावेगपराक्रमः ॥ १६ ॥ भरतनन्दन! वह महान् वेग और पराक्रमसे सम्पन्न हो क्रोधसे ओठ फड़फड़ाता हुआ धनुष उठाकर अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ॥ १६ ॥ ततोऽब्रवीद् वासुदेवः फाल्गुनं पुरुषर्षभम् । दिव्यास्त्रेणैव निर्भिद्य पातयस्व महाबल ॥ १७ ॥ तब वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने पुरुषप्रवर अर्जुनसे इस प्रकार कहा—'महाबली वीर! तुम कर्णको दिव्यास्त्रसे ही घायल करके मार गिराओ' ॥ १७ ॥ एवमुक्तस्तु देवेन क्रोधमागात्तदार्जुनः । मन्युमभ्याविशद् घोरं स्मृत्वा तत्तु धनंजयः ॥ १८ ॥
भगवान्के ऐसा कहनेपर अर्जुन उस समय कर्णके प्रति अत्यन्त कुपित हो उठे। उसकी पिछली करतूतोंको याद करके उनके मनमें भयानक रोष जाग उठा ।। १८ ।। तस्य क्रुद्धस्य सर्वेभ्यः स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिषः । प्रादुरासंस्तदा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १९ ॥ कुपित होनेपर उनके सभी छिद्रोंसे—रोम-रोमसे आगकी चिनगारियाँ छूटने लगीं। राजन्! उस समय वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ १९ ॥ तत् समीक्ष्य ततः कर्णो ब्रह्मास्त्रेण धनंजयम् । अभ्यवर्षत् पुनर्यत्नमकरोद् रथसर्जने ॥ २० ॥ यह देख कर्णने अर्जुनपर ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके बाणोंकी झड़ी लगा दी और पुनः रथको उठानेका प्रयत्न किया ॥ २० ॥ ब्रह्मास्त्रेणैव तं पार्थो ववर्ष शरवृष्टिभिः । तदस्त्रमस्त्रेणावार्य प्रजहार च पाण्डवः ॥ २१ ॥ तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने भी ब्रह्मास्त्रसे ही उसके अस्त्रको दबाकर उसके ऊपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी और उसे अच्छी तरह घायल किया ॥ २१ ॥ ततोऽन्यदस्त्रं कौन्तेयो दयितं जातवेदसः । मुमोच कर्णमुद्दिश्य तत् प्रजज्वाल तेजसा ॥ २२ ॥ तदनन्तर कुन्तीकुमारने कर्णको लक्ष्य करके दूसरे दिव्यास्त्रका प्रयोग किया जो जातवेदा अग्निका प्रिय अस्त्र था। वह आग्नेयास्त्र अपने तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ २२ ॥ वारुणेन ततः कर्णः शमयामास पावकम् । जीमूतैश्च दिशः सर्वाश्चक्रे तिमिरदुर्दिनाः ॥ २३ ॥ परंतु कर्णने वारुणास्त्रका प्रयोग करके उस अग्निको बुझा दिया। साथ ही सम्पूर्ण दिशाओंमें मेघोंकी घटा घिर आयी और सब ओर अन्धकार छा गया ॥ २३ ॥ पाण्डवेयस्त्वसम्भ्रान्तो वायव्यास्त्रेण वीर्यवान् । अपोवाह तदाभ्राणि राधेयस्य प्रपश्यतः ॥ २४ ॥ पराक्रमी अर्जुन इससे विचलित नहीं हुए। उन्होंने राधापुत्र कर्णके देखते-देखते वायव्यास्त्रसे उन बादलोंको उड़ा दिया ॥ २४ ॥ ततः शरं महाघोरं ज्वलन्तमिव पावकम् । आददे पाण्डुपुत्रस्य सूतपुत्रो जिघांसया ॥ २५ ॥ तब सूतपुत्रने पाण्डुकुमार अर्जुनका वध करनेके लिये जलती हुई आगके समान एक महाभयंकर बाण हाथमें लिया ॥ २५ ॥ योज्यमाने ततस्तस्मिन् बाणे धनुषि पूजिते । चचाल पृथिवी राजन् सशैलवनकानना ॥ २६ ॥
राजन्! उस उत्तम बाणको धनुषपर चढ़ाते ही पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वी डगमगाने लगी ॥ २६ ॥ ववौ सशर्करो वायुर्दिशश्च रजसा वृताः । हाहाकारश्च संजज्ञे सुराणां दिवि भारत ॥ २७ ॥ भारत! कंकड़ोंकी वर्षा करती हुई प्रचण्ड वायु चलने लगी। सम्पूर्ण दिशाओंमें धूल छा गयी और स्वर्गके देवताओंमें भी हाहाकार मच गया ॥ २७ ॥ तमिषुं संधितं दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मारिष । विषादं परमं जग्मुः पाण्डवा दीनचेतसः ॥ २८ ॥ माननीय नरेश! जब सूतपुत्रने उस बाणका संधान किया, उस समय उसे देखकर समस्त पाण्डव दीनचित्त हो बड़े भारी विषादमें डूब गये ॥ २८ ॥ स सायकः कर्णभुजप्रमुक्तः शक्राशनिप्रख्यर्रुचिः शिताग्रः ॥ २९ ॥ भुजान्तरं प्राप्य धनंजयस्य विवेश वल्मीकमिवोरगोत्तमः । कर्णके हाथसे छूटा हुआ वह बाण इन्द्रके वज्रके समान प्रकाशित हो रहा था। उसका अग्रभाग बहुत तेज था। वह अर्जुनकी छातीमें जा लगा और जैसे उत्तम सर्प बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह उनके वक्षःस्थलमें समा गया ॥ स गाढविद्धः समरे महात्मा विघूर्णमानः श्लथहस्तगाण्डिवः ॥ ३० ॥ चचाल बीभत्सुरमित्रमर्दनः क्षितेः प्रकम्पे च यथाचलोत्तमः । समरांगणमें उस बाणकी गहरी चोट खाकर महात्मा अर्जुनको चक्कर आ गया। गाण्डीव धनुषपर रखा हुआ उनका हाथ ढीला पड़ गया और वे शत्रुमर्दन अर्जुन भूकम्पके समय हिलते हुए श्रेष्ठ पर्वतके समान काँपने लगे ॥ ३० ½ ॥ तदन्तरं प्राप्य वृषो महारथो रथाङ्गमुर्वीगतमुज्जिहीर्षुः ॥ ३१ ॥ रथादवप्लुत्य निगृह्य दोर्भ्यां शशाक दैवान्न महाबलोऽपि । इसी बीचमें मौका पाकर महारथी कर्णने धरतीमें धँसे हुए पहियेको निकालनेका विचार किया। वह रथसे कूद पड़ा और दोनों हाथोंसे पकड़कर उसे ऊपर उठानेकी कोशिश करने लगा; परंतु महाबलवान् होनेपर भी वह दैववश अपने प्रयासमें सफल न हो सका ॥ ३१ ½ ॥ ततः किरीटी प्रतिलभ्य संज्ञां
जग्राह बाणं यमदण्डकल्पम् ॥ ३२ ॥
ततोऽर्जुनः प्राञ्जलिकं महात्मा
ततोऽब्रवीद् वासुदेवोऽपि पार्थम् ।
छिन्ध्यस्य मूर्धानमरेः शरेण
न यावदारोहति वै रथं वृषः ॥ ३३ ॥
इसी समय होशमें आकर किरीटधारी महात्मा अर्जुनने यमदण्डके समान भयंकर आंजलिक नामक बाण हाथमें लिया। यह देख भगवान् श्रीकृष्णने भी अर्जुनसे कहा—'पार्थ! कर्ण जबतक रथपर नहीं चढ़ जाता तबतक ही अपने बाणके द्वारा इस शत्रु का मस्तक काट डालो' ॥
तथैव सम्पूज्य स तद् वचः प्रभो-
स्ततः शरं प्रज्वलितं प्रगृह्य ।
जघान कक्षाममलार्कवर्णां
महारथे रथचक्रे विमग्ने ॥ ३४ ॥
तब 'बहुत अच्छा' कहकर अर्जुनने भगवान्की उस आज्ञाको सादर शिरोधार्य किया और उस प्रज्वलित बाणको हाथमें लेकर जिसका पहिया फँसा हुआ था, कर्णके उस विशाल रथपर फहराती हुई सूर्यके समान प्रकाशमान ध्वजापर प्रहार किया ॥ ३४ ॥
तं हस्तिकक्षाप्रवरं च केतुं
सुवर्णमुक्तामणिवज्रपृष्ठम् ।
ज्ञानप्रकर्षोत्तमशिल्पियुक्तैः
कृतं सुरूपं तपनीयचित्रम् ॥ ३५ ॥
हाथीकी साँकलके चिह्नसे युक्त उस श्रेष्ठ ध्वजाके पृष्ठभागमें सुवर्ण, मुक्ता, मणि और हीरे जड़े हुए थे। अत्यन्त ज्ञानवान् एवं उत्तम शिल्पियोंने मिलकर उस सुवर्णजटित सुन्दर ध्वजाका निर्माण किया था ॥ ३५ ॥
जयास्पदं तव सैन्यस्य नित्य-
ममित्रवित्रासनमीड्यरूपम् ।
विख्यातमादित्यसमं स्म लोके
त्विषा समं पावकभानुचन्द्रैः ॥ ३६ ॥
वह विश्वविख्यात ध्वजा आपकी सेनाकी विजयका आधार स्तम्भ होकर सदा शत्रुओंको भयभीत करती रहती थी। उसका स्वरूप प्रशंसाके ही योग्य था। वह अपनी प्रभासे सूर्य, चन्द्रमा और अग्निकी समानता करती थी ॥ ३६ ॥
ततः क्षुरप्रेण सुसंशितेन
सुवर्णपुङ्खेन हुताग्निवर्चसा ।
श्रिया ज्वलन्तं ध्वजमुन्ममाथ
महारथस्याधिरथेः किरीटी ॥ ३७ ॥ किरीटधारी अर्जुनने सोनेके पंखवाले और आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान तेजस्वी उस तीखे क्षुरप्रसे महारथी कर्णके उस ध्वजको नष्ट कर दिया, जो अपनी प्रभासे निरन्तर देदीप्यमान होता रहता था ॥ ३७ ॥
यशश्च दर्पश्च तथा प्रियाणि सर्वाणि कार्याणि च तेन केतुना । साकं कुरूणां हृदयानि चापतन् बभूव हाहेति च निःस्वनो महान् ॥ ३८ ॥ कटकर गिरते हुए उस ध्वजके साथ ही कौरवोंके यश, अभिमान, समस्त प्रिय कार्य तथा हृदयका भी पतन हो गया और चारों ओर महान् हाहाकार मच गया ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा ध्वजं पतितमाशुकारिणा कुरुप्रवीरेण निकृत्तमाहवे । नाशांसिरे सूतपुत्रस्य सर्वे जयं तदा भारत ये त्वदीयाः ॥ ३९ ॥ भारत! शीघ्रकारी कौरव वीर अर्जुनके द्वारा युद्धस्थलमें उस ध्वजको काटकर गिराया हुआ देख उस समय आपके सभी सैनिकोंने सूतपुत्रकी विजयकी आशा त्याग दी ॥ ३९ ॥
अथ त्वरन् कर्णवधाय पार्थो महेन्द्रवज्रानलदण्डसंनिभम् । आदत्त चाथाञ्जलिकं निषङ्गात् सहस्ररश्मेरिव रश्मिमुत्तमम् ॥ ४० ॥ तदनन्तर कर्णके वधके लिये शीघ्रता करते हुए अर्जुनने अपने तरकससे एक अंजलिक नामक बाण निकाला, जो इन्द्रके वज्र और अग्निके दण्डके समान भयंकर तथा सूर्यकी एक उत्तम किरणके समान कान्तिमान् था ॥ ४० ॥
मर्मच्छिदं शोणितमांसदिग्धं वैश्वानरार्कप्रतिमं महार्हम् । नराश्वनागासुहरं त्र्यरत्निं षड्वाजमज्जोगतिमुग्रवेगम् ॥ ४१ ॥ सहस्रनेत्राशनितुल्यवीर्यं कालानलं व्यात्तमिवातिघोरम् । पिनाकनारायणचक्रसंनिभं भयङ्करं प्राणभृतां विनाशनम् ॥ ४२ ॥ वह शत्रुके मर्मस्थलको छेदनेमें समर्थ, रक्त और मांससे लिप्त होनेवाला, अग्नि तथा सूर्यके तुल्य तेजस्वी, बहुमूल्य, मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके प्राण लेनेवाला, मूठी बाँधे हुए
हाथसे तीन हाथ बड़ा, छः पंखोंसे युक्त, शीघ्रगामी, भयंकर वेगशाली, इन्द्रके वज्रके तुल्य पराक्रम प्रकट करनेवाला, मुँह बाये हुए कालाग्निके समान अत्यन्त भयानक, भगवान् शिवके पिनाक और नारायणके चक्र-सदृश भयदायक तथा प्राणियोंका विनाश करनेवाला था ।।
जग्राह पार्थः स शरं प्रहृष्टो यो देवसङ्घैरपि दुर्নিবার्यः । सम्पूजितो यः सततं महात्मा देवासुरान् यो विजयेन्महेषुः ॥ ४३ ॥ देवताओंके समुदाय भी जिनकी गतिको अनायास नहीं रोक सकते, जो सदा सबके द्वारा सम्मानित, महामनस्वी, विशाल बाण धारण करनेवाले और देवताओं तथा असुरोंपर भी विजय पानेमें समर्थ हैं उन कुन्तीकुमार अर्जुनने अत्यन्त प्रसन्न होकर उस बाणको हाथमें लिया ।। ४३ ।।
तं वै प्रमृष्टं प्रसमीक्ष्य युद्धे चचाल सर्वं सचराचरं जगत् । स्वस्ति जगत् स्यादृषयः प्रचुक्रुशु- स्तमुद्यतं प्रेक्ष्य महाहवेषुम् ॥ ४४ ॥ महायुद्धमें उस बाणको हाथमें लिया और ऊपर उठाया गया देख समस्त चराचर जगत् काँप उठा। ऋषिलोग जोर-जोरसे पुकार उठे कि 'जगत्का कल्याण हो!' ॥ ४४ ॥
ततस्तु तं वै शरमप्रमेयं गाण्डीवधन्वा धनुषि व्ययोजयत् । युक्त्वा महास्त्रेण परेण चापं विकृष्य गाण्डीवमुवाच सत्वरम् ॥ ४५ ॥ तत्पश्चात् गाण्डीवधारी अर्जुनने उस अप्रमेय शक्तिशाली बाणको धनुषपर रखा और उसे उत्तम एवं महान् दिव्यास्त्रसे अभिमन्त्रित करके तुरंत ही गाण्डीवको खींचते हुए कहा — ॥ ४५ ॥
अयं महास्त्रप्रहितो महाशरः शरीरहृच्चासुहरश्च दुर्हृदः । तपोऽस्ति तप्तं गुरवश्च तोषिता मया यदीष्टं सुहृदां श्रुतं तथा ॥ ४६ ॥ अनेन सत्येन निहन्त्वयं शरः सुसंहितः कर्णमरिं ममोजितम् । इत्यूचिवांस्तं प्रमुमोच बाणं धनंजयः कर्णवधाय घोरम् ॥ ४७ ॥
'यह महान् दिव्यास्त्रसे प्रेरित महाबाण शत्रुके शरीर, हृदय और प्राणोंका विनाश करनेवाला है। यदि मैंने तप किया हो, गुरुजनोंको सेवाद्वारा संतुष्ट रखा हो, यज्ञ किया हो और हितैषी मित्रोंकी बातें ध्यान देकर सुनी हो तो इस सत्यके प्रभावसे यह अच्छी तरह संधान किया हुआ बाण मेरे शक्तिशाली शत्रु कर्णका नाश कर डाले, ऐसा कहकर धनंजयने उस घोर बाणको कर्णके वधके लिये छोड़ दिया ।।
कृत्यामथर्वाङ्गिरसीमिवोग्रां
दीप्तामसह्यां युधि मृत्युनापि ।
ब्रुवन् किरीटी तमतिप्रहृष्टो
ह्ययं शरो मे विजयावहोऽस्तु ।। ४८ ।।
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभावः
कर्णं मयास्तो नयतां यमाय ।
जैसे अथर्वांगिरस मन्त्रोंद्वारा आभिचारिक प्रयोग करके उत्पन्न की हुई कृत्या उग्र, प्रज्वलित और युद्धमें मृत्युके लिये भी असह्य होती है, उसी प्रकार वह बाण भी था। किरीटधारी अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न होकर उस बाणको लक्ष्य करके बोले—'मेरा यह बाण मुझे विजय दिलानेवाला हो। इसका प्रभाव चन्द्रमा और सूर्यके समान है। मेरा छोड़ा हुआ यह घातक अस्त्र कर्णको यमलोक पहुँचा दे' ।।
तेनेषुवर्येण किरीटमाली
प्रहृष्टरूपो विजयावहेन ।। ४९ ।।
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभेण
चक्रे विषक्तं रिपुमाततायी ।
किरीटधारी अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो अपने शत्रुको मारनेकी इच्छासे आततायी बन गये थे। उन्होंने चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले उस विजयदायक श्रेष्ठ बाणसे अपने शत्रुको बींध डाला ।।
तथा विमुक्तो बलिनार्कतेजाः
प्रज्वालयामास दिशो नभश्च ।
ततोऽर्जुनस्तस्य शिरो जहार
वृत्रस्य वज्रेण यथा महेन्द्रः ।। ५० ।।
बलवान् अर्जुनके द्वारा इस प्रकार छोड़ा हुआ वह सूर्यके तुल्य तेजस्वी बाण आकाश एवं दिशाओंको प्रकाशित करने लगा। जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे वृत्रासुरका मस्तक काट लिया था, उसी प्रकार अर्जुनने उस बाणद्वारा कर्णका सिर धड़से अलग कर दिया ।। ५० ।।
शरोत्तमेनाञ्जलिकेन राजं-
स्तदा महास्त्रप्रतिमन्त्रितेन ।
पार्थोऽपराह्ले शिर उच्चकर्त
वैकर्तनस्याथ महेन्द्रसूनुः ॥ ५१ ॥
राजन्! महान् दिव्यास्त्रसे अभिमन्त्रित अंजलिक नामक उत्तम बाणके द्वारा इन्द्रपुत्र
कुन्तीकुमार अर्जुनने अपराह्नकालमें वैकर्तन कर्णका सिर काट लिया ॥ ५१ ॥
तत् प्रापतच्चाञ्जलिकेन छिन्न-
मथास्य कायो निपपात पश्चात् ।
तदुद्यतादित्यसमानतेजसं
शरन्नभोमध्यगभास्करोपमम् ॥ ५२ ॥
वराङ्गमूर्व्यामपतच्चमूमुखे
दिवाकरोऽस्तादिव रक्तमण्डलः ।
अंजलिकसे कटा हुआ कर्णका वह मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके बाद उसका
शरीर भी धराशायी हो गया। जैसे लाल मण्डलवाला सूर्य अस्ताचलसे नीचे गिरता है, उसी
प्रकार उदित सूर्यके समान तेजस्वी तथा शरत्कालीन आकाशके मध्यभागमें तपनेवाले
भास्करके समान दुःसह वह मस्तक सेनाके अग्रभागमें पृथ्वीपर जा गिरा ॥ ५२ १/२ ॥
ततोऽस्य देहं सततं सुखोचितं
सुरूपमत्यर्थमुदारकर्मणः ॥ ५३ ॥
परेण कृच्छ्रेण शिरः समत्यजद्
गृहं महर्धीव सुसङ्गमीश्वरः ।
तदनन्तर सदा सुख भोगनेके योग्य, उदारकर्मा कर्णके उस अत्यन्त सुन्दर शरीरको
उसके मस्तकने बड़ी कठिनाईसे छोड़ा। ठीक उसी तरह, जैसे धनवान् पुरुष अपने
समृद्धिशाली घरको और मन एवं इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला पुरुष सत्संगको बड़े कष्टसे
छोड़ पाता है ॥ ५३ १/२ ॥
शरैर्विभिन्नं व्यसु तत् सुवर्चसः
पपात कर्णस्य शरीरमुच्छ्रितम् ॥ ५४ ॥
स्रवद्व्रणं गैरिकतोयविस्रवं
गिरेर्यथा वज्रहतं महाशिरः ।
देहाच्च कर्णस्य निपातितस्य
तेजः सूर्य खं वितत्याविवेश ॥ ५५ ॥
तेजस्वी कर्णका वह ऊँचा शरीर बाणोंसे क्षत-विक्षत हो घावोंसे खूनकी धारा बहाता
हुआ प्राणशून्य होकर गिर पड़ा, मानो वज्रके आघातसे भग्न हुआ किसी पर्वतका विशाल
शिखर गेरुमिश्रित जलकी धारा बहा रहा हो। धरतीपर गिराये गये कर्णके शरीरसे एक तेज
निकलकर आकाशमें फैल गया और ऊपर जाकर सूर्यमण्डलमें विलीन हो गया ॥
तदद्भुतं सर्वमनुष्ययोधाः
संदृष्टवन्तो निहते स्म कर्णे ।
ततः शङ्खान् पाण्डवा दध्मुुरुच्चै- र्दृष्ट्वा कर्णं पतितं फाल्गुनेन ।। ५६ ।। इस अद्भुत दृश्यको वहाँ खड़े हुए सब लोगोंने अपनी आँखों देखा था। कर्णके मारे जानेपर उसे अर्जुनद्वारा गिराया हुआ देख पाण्डवोंने उच्च स्वरसे शंख बजाया ।। ५६ ।।
तथैव कृष्णश्च धनंजयश्च हृष्टौ यमौ दध्मतुर्वारिजातौ । तं सोमकाः प्रेक्ष्य हतं शयानं सैन्यैः सार्धं सिंहनादान् प्रचक्रुः ।। ५७ ।। इसी प्रकार श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा हर्षमें भरे हुए नकुल-सहदेवने भी शंख बजाये। सोमकगण कर्णको मरकर गिरा हुआ देख अपनी सेनाओंके साथ सिंहनाद करने लगे ।।
तूर्याणि संजघ्नुरतीव हृष्टा वासांसि चैवादुधुवुर्भुजांश्च । संवर्धयन्तश्च नरेन्द्र योधाः पार्थं समाजग्मुरतीव हृष्टाः ।। ५८ ।। वे बड़े हर्षमें भरकर बाजे-बजाने और कपड़े तथा हाथ हिलाने लगे। नरेन्द्र! अत्यन्त हर्षमें भरे हुए पाण्डव योद्धा अर्जुनको बधाई देते हुए उनके पास आकर मिले ।।
बलान्विताश्चापरे ह्याप्यनृत्य- न्नन्योन्यमाश्लिष्य नदन्त ऊचुः । दृष्ट्वा तु कर्णं भुवि वा विपन्नं कृत्तं रथात् सायकैरर्जुनस्य ।। ५९ ।। अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न एवं प्राणशून्य हुए कर्णको रथसे नीचे पृथ्वीपर गिरा देख दूसरे बलवान् सैनिक एक-दूसरेको गलेसे लगाकर नाचते और गर्जते हुए बातें करते थे ।।
महानिलेनाद्रिमिवापविद्धं यज्ञावसानेऽग्निमिव प्रशान्तम् । रराज कर्णस्य शिरो निकृत्त- मस्तं गतं भास्करस्येव बिम्बम् ।। ६० ।।
अध्याय (पृष्ठ 2387)
कर्णवध