महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2370, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअस्त्र भूल गया और घोर सर्पमुख बाण अर्जुनके द्वारा काट डाला गया, तब उस अवस्थामें
उन संकटोंको सहन न कर सकनेके कारण कर्ण खिन्न हो उठा और दोनों हाथ हिला-
हिलाकर धर्मकी निन्दा करने लगा ।। ८४-८५ ।।
धर्मप्रधानं किल पाति धर्म
इत्यब्रुवन् धर्मविदः सदैव ।
वयं च धर्मे प्रयताम नित्यं
चर्तुं यथाशक्ति यथाश्रुतं च ।
स चापि निघ्नाति न पाति भक्तान्
मन्ये न नित्यं परिपाति धर्मः ।। ८६ ।।
‘धर्मज्ञ पुरुषोंने सदा ही यह बात कही है कि ‘धर्मपरायण पुरुषकी धर्म सदा रक्षा
करता है। हम अपनी शक्ति और ज्ञानके अनुसार सदा धर्मपालनके लिये प्रयत्न करते रहते
हैं, किंतु वह भी हमें मारता ही है, भक्तोंकी रक्षा नहीं करता; अतः मैं समझता हूँ, धर्म सदा
किसकी रक्षा नहीं करता' ।। ८६ ।।
एवं ब्रुवन् प्रस्खलिताश्वसूतो
विचाल्यमानोऽर्जुनबाणपातैः ।
मर्माभिघाताच्छिथिलः क्रियासु
पुनः पुनर्धर्ममसौ जगर्ह ।। ८७ ।।
ऐसा कहता हुआ कर्ण जब अर्जुनके बाणोंकी मारसे विचलित हो उठा, उसके घोड़े
और सारथि लड़खड़ाकर गिरने लगे और मर्मपर आघात होनेसे वह कार्य करनेमें शिथिल
हो गया तब बारंबार धर्मकी ही निन्दा करने लगा ।। ८७ ।।
ततः शरैर्भीमतरैरविध्यत् त्रिभिराहवे ।
हस्ते कृष्णं तथा पार्थमभ्यविध्यच्च सप्तभिः ।। ८८ ।।
तदनन्तर उसने तीन भयानक बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें श्रीकृष्णके हाथमें चोट पहुँचायी
और अर्जुनको भी सात बाणोंसे बींध डाला ।। ८८ ।।
ततोऽर्जुनः सप्तदश तिग्मवेगानजिह्मगान् ।
इन्द्राशनिसमान् घोरानसृजत् पावकोपमान् ।। ८९ ।।
तत्पश्चात् अर्जुनने इन्द्रके वज्र तथा अग्निके समान प्रचण्ड वेगशाली सत्रह घोर बाण
कर्णपर छोड़े ।। ८९ ।।
निर्भिद्य ते भीमवेगा ह्यपतन् पृथिवीतले ।
कम्पितात्मा ततः कर्णः शक्त्या चेष्टामदर्शयत् ।। ९० ।।
वे भयानक वेगशाली बाण कर्णको घायल करके पृथ्वीपर गिर पड़े। इससे कर्ण काँप
उठा। फिर भी यथाशक्ति युद्धकी चेष्टा दिखाता रहा ।। ९० ।।
बलेनाथ स संस्तभ्य ब्रह्मास्त्रं समुदैरयत् ।