महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2371, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐन्द्रं ततोऽर्जुनश्चापि तं दृष्ट्वाभ्युपमन्त्रयत् ॥ ९१ ॥ उसने बलपूर्वक धैर्य धारण करके ब्रह्मास्त्र प्रकट किया। यह देख अर्जुनने भी ऐन्द्रास्त्रको अभिमन्त्रित किया ।। ९१ ।।
गाण्डीवं ज्यां च बाणांश्च सोऽनुमन्त्र्य परंतपः । व्यसृजच्छरवर्षाणि वर्षाणीव पुरन्दरः ॥ ९२ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने गाण्डीव धनुष, प्रत्यंचा और बाणोंको भी अभिमन्त्रित करके वहाँ शरसमूहोंकी उसी प्रकार वर्षा आरम्भ कर दी, जैसे इन्द्र जलकी वृष्टि करते हैं ।। ९२ ।।
ततस्तेजोमया बाणा रथात् पार्थस्य निःसृताः । प्रादुरासन् महावीर्याः कर्णस्य रथमन्तिकात् ॥ ९३ ॥ तदनन्तर कुन्तीकुमार अर्जुनके रथसे महान् शक्तिशाली और तेजस्वी बाण निकलकर कर्णके रथके समीप प्रकट होने लगे ।। ९३ ।।
तान् कर्णस्त्वग्रतो न्यस्तान् मोघांश्चक्रे महारथः । ततोऽब्रवीद् वृष्णिवीरस्तस्मिन्नस्त्रे विनाशिते ॥ ९४ ॥ महारथी कर्णने अपने सामने आये हुए उन सभी बाणोंको व्यर्थ कर दिया। उस अस्त्रके नष्ट कर दिये जानेपर वृष्णिवंशी वीर भगवान् श्रीकृष्णने कहा— ।। ९४ ।।
विसृजास्त्रं परं पार्थ राधेयो ग्रसते शरान् । ततो ब्रह्मास्त्रमत्युग्रं सम्मन्त्र्य समयोजयत् ॥ ९५ ॥ ‘पार्थ! दूसरा कोई उत्तम अस्त्र छोड़ो। राधापुत्र कर्ण तुम्हारे बाणोंको नष्ट करता जा रहा है।' तब अर्जुनने अत्यन्त भयंकर ब्रह्मास्त्रको अभिमन्त्रित करके धनुषपर रखा ।।
छादयित्वा ततो बाणैः कर्णं प्रत्यस्यदर्जुनः । ततः कर्णः शितैर्बाणैर्ज्यां चिच्छेद सुतेजनैः ॥ ९६ ॥ और उसके द्वारा बाणोंकी वर्षा करके अर्जुनने कर्णको आच्छादित कर दिया। इसके बाद भी वे लगातार बाणोंका प्रहार करते रहे। तब कर्णने तेज किये हुए पैने बाणोंसे अर्जुनके धनुषकी डोरी काट डाली ।।
द्वितीयां च तृतीयां च चतुर्थीं पञ्चमीं तथा । षष्ठीमथास्य चिच्छेद सप्तमीं च तथाष्टमीम् ॥ ९७ ॥ उसने क्रमशः दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं और आठवीं डोरी भी काट दी ।। ९७ ।।
नवमीं दशमीं चास्य तथा चैकादशीं वृषः । ज्याशतं शतसंधानः स कर्णो नावबुध्यते ॥ ९८ ॥ इतना ही नहीं, नवीं, दसवीं और ग्यारहवीं डोरी काटकर भी सौ बाणोंका संधान करनेवाले कर्णको यह पता नहीं चला कि अर्जुनके धनुषमें सौ डोरियाँ लगी हैं ।। ९८ ।।