भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2372

ततो ज्यां विनिधायान्यामभिमन्त्र्य च पाण्डवः ।
शरैरवाकिरत् कर्णं दीप्यमानैरिवाहिभिः ॥ ९९ ॥
तदनन्तर दूसरी डोरी चढ़ाकर पाण्डुकुमार अर्जुनने उसे भी अभिमन्त्रित किया और प्रज्वलित सर्पोंके समान बाणोंद्वारा कर्णको आच्छादित कर दिया ॥ ९९ ॥

तस्य ज्याछेदनं कर्णो ज्यावधानं च संयुगे ।
नान्वबुध्यत शीघ्रत्वात्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १०० ॥
युद्धस्थलमें अर्जुनके धनुषकी डोरी काटना और पुनः दूसरी डोरीका चढ़ जाना इतनी शीघ्रतासे होता था कि कर्णको भी उसका पता नहीं चलता था। वह एक अद्भुत-सी घटना थी ॥ १०० ॥

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य प्रनिघ्नन् सव्यसाचिनः ।
चक्रे चाप्यधिकं पार्थात् स्ववीर्यमतिदर्शयन् ॥ १०१ ॥
कर्ण अपने अस्त्रोंद्वारा सव्यसाची अर्जुनके अस्त्रोंका निवारण करके उन सबको नष्ट कर दिया और अपने पराक्रमका प्रदर्शन करते हुए उसने अपने-आपको अर्जुनसे अधिक शक्तिशाली सिद्ध कर दिखाया ॥ १०१ ॥

ततः कृष्णोऽर्जुनं दृष्ट्वा कर्णास्त्रेण च पीडितम् ।
अभ्यसेत्यब्रवीत् पार्थमातिष्ठास्त्रं व्रजेति च ॥ १०२ ॥
तब श्रीकृष्णने अर्जुनको कर्णके अस्त्रसे पीड़ित हुआ देखकर कहा—'पार्थ! लगातार अस्त्र छोड़ो। उत्तम अस्त्रोंका प्रयोग करो और आगे बढ़े चलो' ॥ १०२ ॥

ततोऽग्निसदृशं घोरं शरं सर्पविषोपमम् ।
अश्मसारमयं दिव्यमभिमन्त्र्य परंतपः ॥ १०३ ॥
रौद्रमस्त्रं समाधाय क्षेप्तुकामं किरीटवान् ।
ततोऽग्रसन्मही चक्रं राधेयस्य तदा नृप ॥ १०४ ॥
तब शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने अग्नि और सर्पविषके समान भयंकर लोहमय दिव्य बाणको अभिमन्त्रित करके उसमें रौद्रास्त्रका आधान किया और उसे कर्णपर छोड़नेका विचार किया। नरेश्वर! इतनेहीमें पृथ्वीने राधापुत्र कर्णके पहियेको ग्रस लिया ॥ १०३-१०४ ॥

ततोऽवतीर्य राधेयो रथादाशु समुद्यतः ।
चक्रं भुजाभ्यामालम्ब्य समुत्क्षेप्तुमियेष सः ॥ १०५ ॥
यह देख राधापुत्र कर्ण शीघ्र ही रथसे उतर पड़ा और उद्योगपूर्वक अपनी दोनों भुजाओंसे पहियेको थामकर उसे ऊपर उठानेका विचार किया ॥ १०५ ॥

सप्तद्वीपा वसुमती सशैलवनकानना ।
जीर्णचक्रा समुत्क्षिप्ता कर्णेन चतुरङ्गुलम् ॥ १०६ ॥