भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2373

कर्णने उस रथको ऊपर उठाते समय ऐसा झटका दिया कि सात द्वीपोंसे युक्त, पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी चक्रको निगले हुए ही चार अंगुल ऊपर उठ आयी ॥ १०६ ॥

ग्रस्तचक्रस्तु राधेयः क्रोधादश्रूण्यवर्तयत् ।
अर्जुनं वीक्ष्य संरब्धमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १०७ ॥
पहिया फँस जानेके कारण राधापुत्र कर्ण क्रोधसे आँसू बहाने लगा और रोषावेशसे युक्त अर्जुनकी ओर देखकर इस प्रकार बोला— ॥ १०७ ॥

भो भोः पार्थ महेष्वास मुहूर्तं परिपालय ।
यावच्चक्रमिदं ग्रस्तमुद्धरामि महीतलात् ॥ १०८ ॥
'महाधनुर्धर कुन्तीकुमार! दो घड़ी प्रतीक्षा करो, जिससे मैं इस फँसे हुए पहियेको पृथ्वीतलसे निकाल लूँ ॥ १०८ ॥

सव्यं चक्रं महीग्रस्तं दृष्ट्वा दैवादिदं मम ।
पार्थ कापुरुषाचीर्णमभिसंधिं विसर्जय ॥ १०९ ॥
'पार्थ! दैवयोगसे मेरे इस बायें पहियेको धरतीमें फँसा हुआ देखकर तुम कापुरुषोचित कपटपूर्ण बर्तावका परित्याग करो ॥ १०९ ॥

न त्वं कापुरुषाचीर्णं मार्गमास्थातुमर्हसि ।
ख्यातस्त्वमसि कौन्तेय विशिष्टो रणकर्मसु ॥ ११० ॥
विशिष्टतरमेव त्वं कर्तुमर्हसि पाण्डव ।
'कुन्तीनन्दन! जिस मार्गपर कायर चला करते हैं, उसीपर तुम भी न चलो; क्योंकि तुम युद्धकर्ममें विशिष्ट वीरके रूपमें विख्यात हो। पाण्डुनन्दन! तुम्हें तो अपने-आपको और भी विशिष्ट ही सिद्ध करना चाहिये ॥ ११० ½ ॥

प्रकीर्णकेशे विमुखे ब्राह्मणेऽथ कृताञ्जलौ ॥ १११ ॥
शरणागते न्यस्तशस्त्रे याचमाने तथाऽर्जुन ।
अबाणे भ्रष्टकवचे भ्रष्टभग्नायुधे तथा ॥ ११२ ॥
न विमुञ्चन्ति शस्त्राणि शूराः साधुव्रते स्थिताः ।
'अर्जुन! जो केश खोलकर खड़ा हो, युद्धसे मुँह मोड़ चुका हो, ब्राह्मण हो, हाथ जोड़कर शरणमें आया हो, हथियार डाल चुका हो, प्राणोंकी भीख माँगता हो, जिसके बाण, कवच और दूसरे-दूसरे आयुध नष्ट हो गये हों, ऐसे पुरुषपर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शूरवीर शस्त्रोंका प्रहार नहीं करते ॥ १११-११२ ½ ॥

त्वं च शूरतमो लोके साधुवृत्तश्च पाण्डव ॥ ११३ ॥
अभिज्ञो युद्धधर्माणां वेदान्तावभृथाप्लुतः ।
दिव्यास्त्रविदमेयात्मा कार्तवीर्यसमो युधि ॥ ११४ ॥