भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2386

ततः शङ्खान् पाण्डवा दध्मुुरुच्चै- र्दृष्ट्वा कर्णं पतितं फाल्गुनेन ।। ५६ ।। इस अद्भुत दृश्यको वहाँ खड़े हुए सब लोगोंने अपनी आँखों देखा था। कर्णके मारे जानेपर उसे अर्जुनद्वारा गिराया हुआ देख पाण्डवोंने उच्च स्वरसे शंख बजाया ।। ५६ ।।

तथैव कृष्णश्च धनंजयश्च हृष्टौ यमौ दध्मतुर्वारिजातौ । तं सोमकाः प्रेक्ष्य हतं शयानं सैन्यैः सार्धं सिंहनादान् प्रचक्रुः ।। ५७ ।। इसी प्रकार श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा हर्षमें भरे हुए नकुल-सहदेवने भी शंख बजाये। सोमकगण कर्णको मरकर गिरा हुआ देख अपनी सेनाओंके साथ सिंहनाद करने लगे ।।

तूर्याणि संजघ्नुरतीव हृष्टा वासांसि चैवादुधुवुर्भुजांश्च । संवर्धयन्तश्च नरेन्द्र योधाः पार्थं समाजग्मुरतीव हृष्टाः ।। ५८ ।। वे बड़े हर्षमें भरकर बाजे-बजाने और कपड़े तथा हाथ हिलाने लगे। नरेन्द्र! अत्यन्त हर्षमें भरे हुए पाण्डव योद्धा अर्जुनको बधाई देते हुए उनके पास आकर मिले ।।

बलान्विताश्चापरे ह्याप्यनृत्य- न्नन्योन्यमाश्लिष्य नदन्त ऊचुः । दृष्ट्वा तु कर्णं भुवि वा विपन्नं कृत्तं रथात् सायकैरर्जुनस्य ।। ५९ ।। अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न एवं प्राणशून्य हुए कर्णको रथसे नीचे पृथ्वीपर गिरा देख दूसरे बलवान् सैनिक एक-दूसरेको गलेसे लगाकर नाचते और गर्जते हुए बातें करते थे ।।

महानिलेनाद्रिमिवापविद्धं यज्ञावसानेऽग्निमिव प्रशान्तम् । रराज कर्णस्य शिरो निकृत्त- मस्तं गतं भास्करस्येव बिम्बम् ।। ६० ।।