महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2398, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशतिसाहस्त्रांस्तावकान् समपोथयत् ॥ २८ ॥ हाथमें गदा लिये बाजके समान विचरते हुए महाबली भीमसेनने आपके उन पचीसों हजार सैनिकोंको मार गिराया ॥ २८ ॥
हत्वा तत्पुरुषानीकं भीमः सत्यपराक्रमः । धृष्टद्युम्नं पुरस्कृत्य तस्थौ तत्र महाबलः ॥ २९ ॥ सत्यपराक्रमी महाबली भीमसेन उस पैदल सेनाका संहार करके धृष्टद्युम्नको आगे किये वहीं खड़े रहे ॥ २९ ॥
धनंजयो रथानीकमभ्यवर्तत वीर्यवान् । माद्रीपुत्रौ तु शकुनिं सात्यकिश्च महारथः ॥ ३० ॥ जवेनाभ्यपतन् हृष्टा घ्नन्तो दौर्योधनं बलम् । दूसरी ओर पराक्रमी अर्जुनने रथसेनापर आक्रमण किया। माद्रीकुमार नकुल-सहदेव और महारथी सात्यकि हर्षमें भरकर दुर्योधनकी सेनाका संहार करते हुए बड़े वेगसे शकुनिपर टूट पड़े ॥ ३० १/२ ॥
तस्याश्वसादीन् सुबहूंस्ते निहत्य शितैः शरैः ॥ ३१ ॥ समभ्यधावंस्त्वरितास्तत्र युद्धमभून्महत् । वे अपने पैने बाणोंद्वारा उसके बहुत-से घुड़सवारोंको मारकर तुरंत ही उसकी ओर भी दौड़े। फिर तो वहाँ बड़ा भारी युद्ध होने लगा ॥ ३१ १/२ ॥
धनंजयोऽपि चाभ्येत्य रथानीकं तव प्रभो ॥ ३२ ॥ विश्रुतं त्रिषु लोकेषु गाण्डीवं व्याक्षिपद् धनुः । प्रभो! अर्जुन भी आपकी रथसेनाके समीप जाकर त्रिभुवनविख्यात गाण्डीव धनुषकी टंकार करने लगे ॥ ३२ १/२ ॥
कृष्णसारथिमायान्तं दृष्ट्वा श्वेतहयं रथम् ॥ ३३ ॥ अर्जुनं चापि योद्धारं त्वदीयाः प्राद्रवन् भयात् । श्रीकृष्ण जिसके सारथि हैं, उस श्वेत घोड़ोंवाले रथ और अर्जुन-जैसे रथी योद्धाको आते देख आपके सैनिक भयसे भागने लगे ॥ ३३ १/२ ॥
विप्रहीणरथाश्चैव शरैश्च परिकर्षिताः ॥ ३४ ॥ पञ्चविंशतिसाहस्राः कालमार्छन् पदातयः । बहुतोंके रथ नष्ट हो गये और कितने ही बाणोंकी मारसे अत्यन्त घायल हो गये। इस प्रकार पचीस हजार पैदल सैनिक कालके गालमें चले गये ॥ ३४ १/२ ॥
हत्वा तान् पुरुषव्याघ्रः पञ्चालानां महारथः ॥ ३५ ॥ पुत्रः पाञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नो महामनाः । भीमसेनं पुरस्कृत्य नचिरात् प्रत्यदृश्यत ॥ ३६ ॥