भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2399

महाधनुर्धरः श्रीमानमित्रगणतापनः ।
पांचालराजकुमार, पांचाल महारथी और महामनस्वी पुरुषसिंह धृष्टद्युम्न उन पैदल सैनिकोंका संहार करके भीमसेनको आगे किये शीघ्र ही वहाँ दिखायी दिये। वे महाधनुर्धर, तेजस्वी और शत्रुसमूहोंको संताप देनेवाले हैं ॥
पारावतसवर्णाश्वं कोविदारमयध्वजम् ।। ३७ ।।
धृष्टद्युम्नं रणे दृष्ट्वा त्वदीयाः प्राद्रवन् भयात् ।
धृष्टद्युम्नके रथके घोड़े कबूतरके समान रंगवाले थे, उनकी ध्वजापर कचनारके वृक्षका चिह्न था। धृष्टद्युम्नको रणमें उपस्थित देख आपके योद्धा भयसे भाग खड़े हुए ।।
गान्धारराजं शीघ्रास्त्रमनुसृत्य यशस्विनौ ।। ३८ ।।
नचिरात् प्रत्यदृश्येतां माद्रीपुत्रौ ससात्यकी ।
गान्धारराज शकुनि शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चला रहा था, यशस्वी माद्रीकुमार नकुल-सहदेव और सात्यकि तुरंत ही उसका पीछा करते दिखायी दिये ।। ३८ १/२ ।।
चेकितानः शिखण्डी च द्रौपदेयाश्च मारिष ।। ३९ ।।
हत्वा त्वदीयं सुमहत् सैन्यं शङ्खांस्तथाधमन् ।
माननीय नरेश! चेकितान, शिखण्डी और द्रौपदीके पाँचों पुत्र आपकी विशाल सेनाका विनाश करके शंख बजाने लगे ।। ३९ १/२ ।।
ते सर्वे तावकान् प्रेक्ष्य द्रवतोऽपि पराङ्मुखान् ।। ४० ।।
अभ्यवर्तन्त संरब्धान् वृषाञ्जित्वा यथा वृषाः ।
उन सबने आपके सैनिकोंको पीठ दिखाकर भागते देख उनका उसी प्रकार पीछा किया, जैसे साँड़ रोषमें भरे हुए दूसरे साँड़ोंको जीतकर उन्हें खदेड़ने लगते हैं ।। ४० १/२ ।।
सेनावशेषं तं दृष्ट्वा तव सैन्यस्य पाण्डवः ।। ४१ ।।
व्यवस्थितः सव्यसाची चुक्रोध बलवान् नृप ।
धनंजयो रथानीकमभ्यवर्तत वीर्यवान् ।। ४२ ।।
विश्रुतं त्रिषु लोकेषु व्याक्षिपद् गाण्डिवं धनुः ।
नरेश्वर! उस समय वहाँ खड़े हुए बलवान् पराक्रमी सव्यसाची पाण्डुपुत्र अर्जुन आपकी सेनाका कुछ भाग अवशिष्ट देखकर कुपित हो उठे और अपने त्रिलोकविख्यात गाण्डीवधनुषकी टंकार करते हुए आपकी रथसेनापर जा चढ़े ।। ४१-४२ १/२ ।।
तत एनाञ्शरव्रातैः सहसा समवाकिरत् ।। ४३ ।।
तमसा संवृतेनाथ न स्म किंचिद् व्यदृश्यत ।
उन्होंने अपने बाणसमूहोंद्वारा उन सबको सहसा आच्छादित कर दिया। उस समय सब ओर अन्धकार फैल गया; अतः कुछ भी दिखायी नहीं देता था ।। ४३ १/२ ।।
अन्धकारीकृते लोके रजोभूते महीतले ।। ४४ ।।