भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2401, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2401

अल्पं च बलमेतेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ ।। ५३ ।। अद्य सर्वान् हनिष्यामि ध्रुवो हि विजयो भवेत् । 'योद्धाओ! तुम भयसे पीड़ित हो रहे हो। परंतु मैं ऐसा कोई स्थान नहीं देखता, जहाँ तुम भागकर जाओ और वहाँ जानेपर तुम्हें पाण्डुपुत्र अर्जुन या भीमसेनसे छुटकारा मिल जाय। ऐसी दशामें तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है? इन शत्रुओंके पास थोड़ी-सी ही सेना बच गयी है। श्रीकृष्ण और अर्जुन भी बहुत घायल हो चुके हैं; अतः आज मैं इन सब लोगोंको मार डालूँगा। हमारी विजय अवश्य होगी ।।

विप्रयातांस्तु वो भिन्नान् पाण्डवाः कृतकिल्बिषान् ।। ५४ ।। अनुसृत्य वधिष्यन्ति श्रेयान् नः समरे वधः । 'यदि तुम अलग-अलग होकर भागोगे तो पाण्डव तुम सब अपराधियोंका पीछा करके तुम्हें मार डालेंगे। ऐसी दशामें युद्धमें मारा जाना ही हमारे लिये श्रेयस्कर है ।।

सुखं सांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम् ।। ५५ ।। मृतो दुःखं न जानीते प्रेत्य चानन्त्यमश्रुते । 'क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीरोंकी संग्राममें सुखपूर्वक मृत्यु होती है। वहाँ मरे हुएको मृत्युके दुःखका अनुभव नहीं होता और परलोकमें जानेपर उसे अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है ।। ५५ १/२ ।।

शृणुध्वं क्षत्रियाः सर्वे यावन्तः स्थ समागताः ।। ५६ ।। यदा शूरं च भीरुं च मारयत्यन्तको यमः । को नु मूढो न युध्येत मादृशः क्षत्रियव्रतः ।। ५७ ।। 'तुम जितने क्षत्रिय वीर यहाँ आये हो सभी कान खोलकर सुन लो। जब प्राणियोंका अन्त करनेवाला यमराज शूरवीर और कायर दोनोंको ही मार डालता है, तब मेरे-जैसा क्षत्रियव्रतका पालन करनेवाला होकर भी कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो युद्ध नहीं करेगा? ।। ५६-५७ ।।

द्विषतो भीमसेनस्य क्रुद्धस्य वशमेष्यथ । पितामहैराचरितं न धर्मं हातुमर्हथ ।। ५८ ।। 'हमारा शत्रु भीमसेन क्रोधमें भरा हुआ है। यदि भागोगे तो उसके वशमें पड़कर मारे जाओगे; अतः अपने बाप-दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए क्षत्रिय-धर्मका परित्याग न करो ।। ५८ ।।

न ह्यधर्मोऽस्ति पापीयान् क्षत्रियस्य पलायनात् । न युद्धधर्माच्छ्रेयो हि पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः । अचिरेण हता लोकान् सद्यो योधाः समश्रुत ।। ५९ ।। 'कौरववीरो! क्षत्रियके लिये युद्धसे पीठ दिखाकर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं है तथा युद्धधर्मके पालनसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्गकी प्राप्तिका कल्याणकारी