भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अल्पं च बलमेतेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ ।। ५३ ।। अद्य सर्वान् हनिष्यामि ध्रुवो हि विजयो भवेत् । 'योद्धाओ! तुम भयसे पीड़ित हो रहे हो। परंतु मैं ऐसा कोई स्थान नहीं देखता, जहाँ तुम भागकर जाओ और वहाँ जानेपर तुम्हें पाण्डुपुत्र अर्जुन या भीमसेनसे छुटकारा मिल जाय। ऐसी दशामें तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है? इन शत्रुओंके पास थोड़ी-सी ही सेना बच गयी है। श्रीकृष्ण और अर्जुन भी बहुत घायल हो चुके हैं; अतः आज मैं इन सब लोगोंको मार डालूँगा। हमारी विजय अवश्य होगी ।।

विप्रयातांस्तु वो भिन्नान् पाण्डवाः कृतकिल्बिषान् ।। ५४ ।। अनुसृत्य वधिष्यन्ति श्रेयान् नः समरे वधः । 'यदि तुम अलग-अलग होकर भागोगे तो पाण्डव तुम सब अपराधियोंका पीछा करके तुम्हें मार डालेंगे। ऐसी दशामें युद्धमें मारा जाना ही हमारे लिये श्रेयस्कर है ।।

सुखं सांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम् ।। ५५ ।। मृतो दुःखं न जानीते प्रेत्य चानन्त्यमश्रुते । 'क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीरोंकी संग्राममें सुखपूर्वक मृत्यु होती है। वहाँ मरे हुएको मृत्युके दुःखका अनुभव नहीं होता और परलोकमें जानेपर उसे अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है ।। ५५ १/२ ।।

शृणुध्वं क्षत्रियाः सर्वे यावन्तः स्थ समागताः ।। ५६ ।। यदा शूरं च भीरुं च मारयत्यन्तको यमः । को नु मूढो न युध्येत मादृशः क्षत्रियव्रतः ।। ५७ ।। 'तुम जितने क्षत्रिय वीर यहाँ आये हो सभी कान खोलकर सुन लो। जब प्राणियोंका अन्त करनेवाला यमराज शूरवीर और कायर दोनोंको ही मार डालता है, तब मेरे-जैसा क्षत्रियव्रतका पालन करनेवाला होकर भी कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो युद्ध नहीं करेगा? ।। ५६-५७ ।।

द्विषतो भीमसेनस्य क्रुद्धस्य वशमेष्यथ । पितामहैराचरितं न धर्मं हातुमर्हथ ।। ५८ ।। 'हमारा शत्रु भीमसेन क्रोधमें भरा हुआ है। यदि भागोगे तो उसके वशमें पड़कर मारे जाओगे; अतः अपने बाप-दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए क्षत्रिय-धर्मका परित्याग न करो ।। ५८ ।।

न ह्यधर्मोऽस्ति पापीयान् क्षत्रियस्य पलायनात् । न युद्धधर्माच्छ्रेयो हि पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः । अचिरेण हता लोकान् सद्यो योधाः समश्रुत ।। ५९ ।। 'कौरववीरो! क्षत्रियके लिये युद्धसे पीठ दिखाकर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं है तथा युद्धधर्मके पालनसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्गकी प्राप्तिका कल्याणकारी

मार्ग भी नहीं है; अतः योद्धाओ! तुम युद्धमें मारे जाकर शीघ्र ही उत्तम लोकोंके सुखका अनुभव करो' ॥ ५९ ॥

संजय उवाच

एवं ब्रुवति पुत्रे ते सैनिका भृशविक्षताः ।
अनवेक्ष्यैव तद्वाक्यं प्राद्रवन् सर्वतो दिशः ॥ ६० ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! आपका पुत्र इस प्रकार व्याख्यान देता ही रह गया; किंतु अत्यन्त घायल हुए सैनिक उसकी बातपर ध्यान दिये बिना ही सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ६० ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कौरवसैन्यपलायने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कौरवसेनाका पलायनविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2403)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्नवतितमोऽध्यायः

शल्यके द्वारा रणभूमिका दिग्दर्शन, कौरव-सेनाका पलायन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनका शिविरकी ओर गमन

संजय उवाच

दृष्ट्वा तु सैन्यं परिवर्तमानं
 पुत्रेण ते मद्रपतिस्तदानीम् ।
संत्रस्तरूपः परिमूढचेता
 दुर्योधनं वाक्यमिदं बभाषे ॥ १ ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! आपके पुत्रद्वारा सेनाको पुनः लौटानेका प्रयत्न होता देख उस समय भयभीत और मूढ़चित्त हुए मद्रराज शल्यने दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

शल्य उवाच

पश्येदमग्रं नरवाजिनागै-
 रायोधनं वीरहतैः सुपूर्णम् ।
महीधराभैः पतितैश्च नागैः
 सकृत्प्रभिन्नैः शरभिन्नदेहैः ॥ २ ॥
सुविह्वलद्भिश्च गतासुभिश्च
 प्रध्वस्तवर्मायुधचर्मखड्गैः ।
वज्रापविद्धैरिव चाचलोत्तमै-
 र्विभिन्नपाषाणमहाद्रुमौषधैः ॥ ३ ॥
प्रविद्धघण्टाङ्कुशतोमरध्वजैः
 सहेमजालै रुधिरौघसम्प्लुतैः ।
शरावभिन्नैः पतितैस्तुरङ्गमैः
 श्वसद्भिरार्तैः क्षतजं वमद्भिः ॥ ४ ॥
दीनं स्तनद्भिः परिवृत्तनेत्रै-
 र्महीं दशद्भिः कृपणं नदद्भिः ।
तथापविद्धैर्गजवाजियोधैः
 शरापविद्धैरथ वीरसंघैः ॥ ५ ॥
मन्दासुभिश्चैव गतासुभिश्च
 नराश्वनागैश्च रथैश्च मर्दितैः ।
मन्दांशुभिश्चैव मही महाहवे

नूनं यथा वैतरणीव भाति ॥ ६ ॥ **शल्य बोले—**वीर नरेश! देखो, मारे गये मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंकी लाशोंसे भरा हुआ यही युद्धस्थल कैसा भयंकर जान पड़ता है? पर्वताकार गजराज, जिनके मस्तकोंसे मदकी धारा फूटकर बहती थी, एक ही साथ बाणोंकी मारसे शरीर विदीर्ण हो जानेके कारण धराशायी हो गये हैं। उनमेंसे कितने ही वेदनासे छटपटा रहे हैं, कितनोंके प्राण निकल गये हैं। उनपर बैठे हुए सवारोंके कवच, अस्त्र-शस्त्र, ढाल और तलवार आदि नष्ट हो गये हैं। इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो वज्रके आघातसे बड़े-बड़े पर्वत ढह गये हों और उनके प्रस्तरखण्ड, विशाल वृक्ष तथा औषधसमूह छिन्न-भिन्न हो गये हों। उन गजराजोंके घंटा, अंकुश, तोमर और ध्वज आदि सभी वस्तुएँ बाणोंके आघातसे टूट-फूटकर बिखर गयी हैं। उन हाथियोंके ऊपर सोनेकी जालीसे युक्त आवरण पड़ा है। उनकी लाशें रक्तके प्रवाहसे नहा गयी हैं। घोड़े बाणोंसे विदीर्ण होकर गिरे हैं, वेदनासे व्यथित हो उच्छ्वास लेते और मुखसे रक्त वमन करते हैं। वे दीनतापूर्ण आर्तनाद कर रहे हैं। उनकी आँखें घूम रही हैं। वे धरतीमें दाँत गड़ाते और करुण चीत्कार करते हैं। हाथी, घोड़े, पैदल सैनिक तथा वीरसमुदाय बाणोंसे क्षत-विक्षत हो मरे पड़े हैं। किन्हींकी साँसें कुछ-कुछ चल रही हैं और कुछ लोगोंके प्राण सर्वथा निकल गये हैं। हाथी, घोड़े, मनुष्य और रथ कुचल दिये गये हैं। इन सबकी कान्ति मन्द पड़ गयी है। इनके कारण उस महासमरकी भूमि निश्चय ही वैतरणीके समान प्रतीत होती है ॥ २—६ ॥

गजैर्निकृत्तैर्वरहस्तगात्रै- रुद्वेपमानैः पतितैः पृथिव्याम् । विशीर्णदन्तैः क्षतजं वमद्भिः स्फुरद्भिरार्तैः करुणं नदद्भिः ॥ ७ ॥ हाथियोंके शुण्डदण्ड और शरीर छिन्न-भिन्न हो गये हैं। कितने ही हाथी पृथ्वीपर गिरकर काँप रहे हैं, कितनोंके दाँत टूट गये हैं और वे खून उगलते तथा छटपटाते हुए वेदनाग्रस्त हो करुण स्वरमें कराह रहे हैं ॥ ७ ॥

निकृत्तचक्रेषयुगैः सयोक्त्रैः प्रविद्धतूणीरपताककेतुभिः । सुवर्णजालावततैर्भृशाहतै- र्महारथौघैर्जलदैरिवावृता ॥ ८ ॥ बड़े-बड़े रथोंके समूह इस रणभूमिमें बादलोंके समान छा गये हैं। उनके पहिये, बाण, जूए और बन्धन कट गये हैं। तरकस, ध्वज और पताकाएँ फेंकी पड़ी हैं; सोनेके जालसे आवृत्त हुए वे रथ बहुत ही क्षतिग्रस्त हो गये हैं ॥ ८ ॥

यशस्विभिर्नागरथाश्वयोधिभिः पदातिभिश्चाभिमुखैर्हतैः परैः ।

विशीर्णवर्माभरणाम्बरायुधै- वृता प्रशान्तैरिव तावकैर्मही ॥ ९ ॥

हाथी, रथ और घोड़ोंपर सवार होकर युद्ध करनेवाले यशस्वी योद्धा और पैदल वीर सामने लड़ते हुए शत्रुओंके हाथसे मारे गये हैं। उनके कवच, आभूषण, वस्त्र और आयुध सभी छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये हैं। इस प्रकार शान्त पड़े हुए आपके प्राणहीन योद्धाओंसे यह पृथ्‍वी पट गयी है ॥ ९ ॥

शरप्रहाराभिहतैर्महाबलै- रवेक्ष्यमाणैः पतितैः सहस्रशः । दिवश्च्युतैर्भूरतिदीप्तिमद्भि- र्नक्तं ग्रहैद्यौरमलप्रदीप्तैः ॥ १० ॥

बाणोंके प्रहारसे घायल होकर गिरे हुए सहस्रों महाबली योद्धा आकाशसे नीचे गिरे हुए अत्यन्त दीप्तिमान् एवं निर्मल प्रभासे प्रकाशित ग्रहोंके समान दिखायी देते हैं और उनसे ढकी हुई यह भूमि रातके समय उन ग्रहोंसे व्याप्त हुए आकाशके सदृश सुशोभित होती है ॥ १० ॥

प्रणष्टसंज्ञैः पुनरुच्छ्वसद्भि- र्मही बभूवानुगतैरिवाग्निभिः । कर्णार्जुनाभ्यां शरभिन्नगात्रै- र्हतैः प्रवीरैः कुरुसृञ्जयानाम् ॥ ११ ॥

कर्ण और अर्जुनके बाणोंसे जिनके अंग-अंग छिन्न-भिन्न हो गये हैं, उन मारे गये कौरव-संजय वीरोंकी लाशोंसे भरी हुई भूमि यज्ञमें स्थापित हुई अग्नियोंके द्वारा यज्ञभूमिके समान सुशोभित होती है। उनमेंसे कितने ही वीरोंकी चेतना लुप्त हो गयी है और कितने ही पुनः साँस ले रहे हैं ॥ ११ ॥

शरास्तु कर्णार्जुनबाहुमुक्ता विदार्य नागाश्वमनुष्यदेहान् । प्राणान् निरस्याशु महीं प्रतीयु- र्महोरगा वासमिवातिताम्राः ॥ १२ ॥

कर्ण और अर्जुनके हाथोंसे छूटे हुए बाण हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके उनके प्राण निकालकर तुरंत पृथ्वीमें घुस गये थे, मानो अत्यन्त लाल रंगके विशाल सर्प अपनी बिलमें जा घुसे हों ॥

हतैर्मनुष्याश्वगजैश्च संख्ये शरापविद्धैश्च रथैनरिन्द्र । धनंजयस्याधिरथेश्च मार्गणै- रगम्यरूपा वसुधा बभूव ॥ १३ ॥

नरेन्द्र! अर्जुन और कर्णके बाणोंद्वारा मारे गये हाथी, घोड़े एवं मनुष्योंसे तथा बाणोंसे नष्ट-भ्रष्ट होकर गिरे पड़े रथोंसे इस पृथ्वीपर चलना-फिरना असम्भव हो गया है ।। १३ ।। रथैर्वरिष्ठून्मथितैः सुकल्पैः सयोधशस्त्रैश्च वरायुधैर्ध्वजैः । विशीर्णयोक्त्रैर्विनिकृत्तबन्धनै- र्निकृत्तचक्राक्षयुगत्रिवेणुभिः ॥ १४ ॥ सजे-सजाये रथ बाणोंके आघातसे मथ डाले गये हैं। उनके साथ जो योद्धा, शस्त्र, श्रेष्ठ आयुध और ध्वज आदि थे, उनकी भी यही दशा हुई है। उनके पहिये, बन्धनरज्जु, धुरे, जूए और त्रिवेणु काष्ठके भी टुकड़े-टुकड़े हो गये हैं ॥ १४ ॥ विमुक्तशस्त्रैश्च तथा व्युपस्करै- र्हतानुकर्षैर्विनिषङ्गबन्धनैः । प्रभग्ननीडैर्मणिहेमभूषितैः स्तृता मही द्यौरिव शारदैर्घनैः ॥ १५ ॥ उनपर जो अस्त्र-शस्त्र रखे गये थे, वे सब दूर जा पड़े हैं। सारी सामग्री नष्ट हो गयी है। अनुकर्ष, तूणीर और बन्धनरज्जु—ये सब-के-सब नष्ट-भ्रष्ट हो गये हैं। उन रथोंकी बैठकें टूट-फूट गयी हैं। सुवर्ण और मणियोंसे विभूषित उन रथोंद्वारा आच्छादित हुई पृथ्वी शरद्-ऋतुके बादलोंसे ढके हुए आकाशके समान जान पड़ती है ॥ १५ ॥ विकृष्यमाणैर्जवनैस्तुरङ्गमै- र्हतेश्वरै राजरथैः सुकल्पितैः । मनुष्यमातङ्गरथाश्वराशिभि- र्द्रुतं व्रजन्तो बहुधा विचूर्णिताः ॥ १६ ॥ जिनके स्वामी (रथी) मारे गये हैं, राजाओंके उन सुसज्जित रथोंको, जब वेगशाली घोड़े खींचे लिये जाते थे और झुंड-के-झुंड मनुष्य, हाथी, साधारण रथ और अश्व भी भागे जा रहे थे, उस समय उनके द्वारा शीघ्रतापूर्वक भागनेवाले बहुत-से मनुष्य कुचलकर चूर-चूर हो गये हैं ॥ १६ ॥ सहेमपट्टाः परिघाः परश्वधाः शिताश्च शूला मुसलानि मुद्गराः । पेतुश्च खड्गा विमला विकोशा गदाश्च जाम्बूनदपट्टनद्धाः ॥ १७ ॥ सुवर्ण-पत्रसे जड़े गये परिघ, फरसे, तीखे शूल, मूसल, मुद्गर, म्यानसे बाहर निकाली हुई चमचमाती तलवारें और स्वर्णजटित गदाएँ जहाँ-तहाँ बिखरी पड़ी हैं ॥ १७ ॥ चापानि रुक्माङ्गदभूषणानि शराश्च कार्तस्वरचित्रपुङ्खाः ।

ऋष्ट्यश्च पीता विमला विकोशाः प्रासाश्च दण्डैः कनकावभासैः ॥ १८ ॥ छत्राणि वालव्यजनानि शङ्खा- श्छिन्नापविद्धाश्च स्रजो विचित्राः । सुवर्णमय अंगदोंसे विभूषित धनुष, सोनेके विचित्र पंखवाले बाण, ऋष्टि, पानीदार एवं कोशरहित निर्मल खड्ग तथा सुनहरे डंडोंसे युक्त प्रास, छत्र, चँवर, शंख और विचित्र मालाएँ छिन्न-भिन्न होकर फेंकी पड़ी हैं ॥ कुथाः पताकाम्बरभूषणानि किरीटमाला मुकुटाश्च शुभ्राः ॥ १९ ॥ प्रकीर्णका विप्रकीर्णाश्च राजन् प्रवालमुक्तातरालाश्च हाराः । राजन्! हाथीकी पीठपर बिछाये जानेवाले कम्बल या झूल, पताका, वस्त्र, आभूषण, किरीटमाला, उज्ज्वल मुकुट, श्वेत चामर, मूँगे और मोतियोंके हार—से सब-के-सब इधर-उधर बिखरे पड़े हैं ॥ १९ १/२ ॥ आपीडकेयूरवराङ्गदानि ग्रैवेयनिष्काः ससुवर्णसूत्राः ॥ २० ॥ मण्युत्तमा वज्रसुवर्णमुक्ता रत्नानि चोच्चावचमङ्गलानि । गात्राणि चात्यन्तसुखोचितानि शिरांसि चेन्दुप्रतिमाननानि ॥ २१ ॥ देहांश्च भोगांश्च परिच्छदांश्च त्यक्त्वा मनोज्ञानि सुखानि चैव । स्वधर्मनिष्ठां महतीमवाप्य व्याप्याशु लोकान् यशसा गतास्ते ॥ २२ ॥ शिरोभूषण, केयूर, सुन्दर अंगद, गलेके हार, पदक, सोनेकी जंजीर, उत्तम मणि, हीरे, सुवर्ण तथा मुक्ता आदि छोटे-बड़े मांगलिक रत्न, अत्यन्त सुख भोगनेके योग्य शरीर, चन्द्रमाको भी लज्जित करनेवाले मुखसे युक्त मस्तक, देह, भोग, आच्छादन-वस्त्र तथा मनोरम सुख—इन सबको त्यागकर स्वधर्मकी पराकाष्ठाका पालन करते हुए सम्पूर्ण लोकोंमें अपने यशका विस्तार करके वे वीर सैनिक दिव्य लोकोंमें पहुँच गये हैं ॥ २०—२२ ॥ निवर्त दुर्योधन यान्तु सैनिका व्रजस्व राजन् शिबिराय मानद । दिवाकरोऽप्येष विलम्बते प्रभो

पुनस्त्वमेवात्र नरेन्द्र कारणम् ॥ २३ ॥
दूसरोंको सम्मान देनेवाले राजा दुर्योधन! अब लौटो। इन सैनिकोंको भी जाने दो। शिबिरमें चलो। प्रभो! ये भगवान् सूर्य भी अस्ताचलपर लटक रहे हैं। नरेन्द्र! तुम्हीं इस नर-संहारके प्रधान कारण हो ॥ २३ ॥
इत्येवमुक्त्वा विरराम शल्यो
दुर्योधनं शोकपरीतचेताः ।
हा कर्ण हा कर्ण इति ब्रुवाण-
मार्तं विसंज्ञं भृशमश्रुनेत्रम् ॥ २४ ॥
दुर्योधनसे ऐसा कहकर राजा शल्य चुप हो गये। उनका चित्त शोकसे व्याकुल हो रहा था। दुर्योधन भी आर्त होकर 'हा कर्ण! हा कर्ण!' पुकारने लगा। वह सुध-बुध खो बैठा था। उसके नेत्रोंसे वेगपूर्वक आँसुओंकी अविरल धारा बह रही थी ॥ २४ ॥
तं द्रोणपुत्रप्रमुखा नरेन्द्राः
सर्वे समाश्वास्य मुहुः प्रयान्ति ।
निरीक्षमाणा मुहुरर्जुनस्य
ध्वजं महान्तं यशसा ज्वलन्तम् ॥ २५ ॥
द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तथा अन्य सभी नरेश बारंबार आकर दुर्योधनको सान्त्वना देते और अर्जुनके महान् ध्वजको, जो उनके उज्ज्वल यशसे प्रकाशित हो रहा था, देखते हुए फिर लौट जाते थे ॥ २५ ॥
नराश्वमातङ्गशरीरजेन
रक्तेन सिक्तां च तथैव भूमिम् ।
रक्ताम्बरस्रक् तपनीययोगा-
न्नारीं प्रकाशामिव सर्वगम्याम् ॥ २६ ॥
मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके शरीरसे बहते हुए रक्तकी धारासे वहाँकी भूमि ऐसी सिंच गयी थी कि लाल वस्त्र, लाल फूलोंकी माला तथा तपाये हुए सुवर्णके आभूषण धारण करके सबके सामने आयी हुई सर्वगम्या नारी (वेश्या)-के समान प्रतीत होती थी ॥ २६ ॥
प्रच्छन्नरूपां रुधिरेण राजन्
रौद्रे मुहूर्तेऽतिविराजमाने ।
नैवावतस्थुः कुरवः समीक्ष्य
प्रव्राजिता देवलोकाय सर्वे ॥ २७ ॥
राजन्! अत्यन्त शोभा पानेवाले उस रौद्रमुहूर्त (सायंकाल)-में, रुधिरसे जिसका स्वरूप छिप गया था, उस भूमिको देखते हुए कौरव-सैनिक वहाँ ठहर न सके। वे सब-के-सब देवलोककी यात्राके लिये उद्यत थे ॥ २७ ॥
वधेन कर्णस्य तु दुःखितास्ते

हा कर्ण हा कर्ण इति ब्रुवाणाः । द्रुतं प्रयाताः शिबिराणि राजन् दिवाकरं रक्तमवेक्षमाणाः ॥ २८ ॥ महाराज! समस्त कौरव कर्णके वधसे अत्यन्त दुःखी हो ‘हा कर्ण! हा कर्ण!’ की रट लगाते और लाल सूर्यकी ओर देखते हुए बड़े वेगसे शिबिरकी ओर चले ॥ २८ ॥

गाण्डीवमुक्तैस्तु सुवर्णपुङ्खैः शिलाशितैः शोणितदिग्धवाजैः । शरैश्चिताङ्गो युधि भाति कर्णो हतोऽपि सन् सूर्य इवांशुमाली ॥ २९ ॥ गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सुवर्णमय पंखवाले और शिलापर तेज किये हुए बाणोंसे कर्णका अंग-अंग बिंध गया था। उन बाणोंकी पाँखें रक्तमें डूबी हुई थीं। उनके द्वारा युद्धस्थलमें पड़ा हुआ कर्ण मर जानेपर भी अंशुमाली सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था ॥ २९ ॥

कर्णस्य देहं रुधिरावसिक्तं भक्तानुकम्पी भगवान् विवस्वान् । स्पृष्ट्वांशुभिर्लोहितरक्तरूपः सिष्णासुरभ्येति परं समुद्रम् ॥ ३० ॥ भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान् सूर्य खूनसे भीगे हुए कर्णके शरीरका किरणोंद्वारा स्पर्श करके रक्तके समान ही लालरूप धारणकर मानो स्नान करनेकी इच्छासे पश्चिम समुद्रकी ओर जा रहे थे ॥ ३० ॥

इतीव संचिन्त्य सुरर्षिसंघाः सम्प्रस्थिता यान्ति यथा निकेतनम् । संचिन्तयित्वा जनता विसस्रु- र्यथासुखं खं च महीतलं च ॥ ३१ ॥ इस युद्धके ही विषयमें सोच-विचार करते हुए देवताओं तथा ऋषियोंके समुदाय वहाँसे प्रस्थित हो अपने-अपने स्थानको चल दिये और इसी विषयका चिन्तन करते हुए अन्य लोग भी सुखपूर्वक अन्तरिक्ष अथवा भूतलपर अपने-अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ३१ ॥

तदद्भुतं प्राणभृतां भयंकरं निशाम्य युद्धं कुरुवीरमुख्ययोः । धनंजयस्याधिरथेश्च विस्मिताः प्रशंसमानाः प्रययुस्तदा जनाः ॥ ३२ ॥ कौरव तथा पाण्डवपक्षके उन प्रमुख वीर अर्जुन और कर्णका वह अद्भुत तथा प्राणियोंके लिये भयंकर युद्ध देखकर सब लोग आश्चर्यचकित हो उनकी प्रशंसा करते हुए

वहाँसे चले गये ।। ३२ ।। शरसंकृत्तवर्माणं रुधिरोक्षितवाससम् । गतासुमपि राधेयं नैव लक्ष्मीर्विमुञ्चति ।। ३३ ।। राधापुत्र कर्णका कवच बाणोंसे कट गया था। उसके सारे वस्त्र खूनसे भीग गये थे और प्राण भी निकल गये थे तो भी उसे शोभा छोड़ नहीं रही थी ।। ३३ ।। तप्तजाम्बूनदनिभं ज्वलनार्कसमप्रभम् । जीवन्तमिव तं शूरं सर्वभूतानि मेनिरे ।। ३४ ।। वह तपाये हुए सुवर्ण तथा अग्नि और सूर्यके समान कान्तिमान् था। उस शूरवीरको देखकर सब प्राणी जीवित-सा समझते थे ।। ३४ ।। हतस्यापि महाराज सूतपुत्रस्य संयुगे । वित्रैसुः सर्वतो योधाः सिंहस्येवेतरे मृगाः ।। ३५ ।। महाराज! जैसे सिंहसे दूसरे जंगली पशु सदा डरते रहते हैं, उसी प्रकार युद्धस्थलमें मारे गये सूतपुत्रसे भी समस्त योद्धा भय मानते थे ।। ३५ ।। हतोऽपि पुरुषव्याघ्र जीववानिव लक्ष्यते । नाभवद् विकृतिः काचिद्गतस्यापि महात्मनः ।। ३६ ।। पुरुषसिंह नरेश! वह मारा जानेपर भी जीवित-सा दीखता था, महामना कर्णके शरीरमें मरनेपर भी कोई विकार नहीं हुआ था ।। ३६ ।। चारुवेषधरं वीरं चारुमौलिशिरोधरम् । तन्मुखं सूतपुत्रस्य पूर्णचन्द्रसमद्युति ।। ३७ ।। सूतपुत्र कर्णका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् था। उसने मनोहर वेष धारण किया था। वह वीरोचित शोभासे सम्पन्न था। उसके मस्तक और कण्ठ भी मनोहर थे ।। ३७ ।। नानाभरणवान् राजंस्तप्तजाम्बूनदाङ्गदः । हतो वैकर्तनः शेते पादपोऽङ्कुरवानिव ।। ३८ ।। राजन्! नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित तथा तपाये हुए सुवर्णका अंगद (बाजूबंद) धारण किये वैकर्तन कर्ण मारा जाकर अंकुरयुक्त वृक्षके समान पड़ा था ।। ३८ ।। कनकोत्तमसंकाशो ज्वलन्निव विभावसुः । स शान्तः पुरुषव्याघ्र पार्थसायकवारिणा ।। ३९ ।। नरव्याघ्र नरेश! उत्तम सुवर्णके समान कान्तिमान् कर्ण प्रज्वलित अग्निके तुल्य प्रकाशित होता था; परंतु पार्थके बाणरूपी जलसे वह बुझ गया ।। ३९ ।। यथा हि ज्वलनो दीप्तो जलमासाद्य शाम्यति । कर्णाग्निः समरे तद्वत् पार्थमेघेन शामितः ।। ४० ।।

जैसे प्रज्वलित आग जलको पाकर बुझ जाती है, उसी प्रकार समरांगणमें कर्णरूपी अग्निको अर्जुनरूपी मेघने बुझा दिया ॥ ४० ॥

आहृत्य च यशो दीप्तं सुयुद्धेनात्मनो भुवि ।
विसृज्य शरवर्षाणि प्रताप्य च दिशो दश ॥ ४१ ॥
सपुत्रः समरे कर्णः स शान्तः पार्थतेजसा ।
इस पृथ्वीपर उत्तम युद्धके द्वारा अपने लिये उत्तम यशका उपार्जन करके, बाणोंकी झड़ी लगाकर, दसों दिशाओंको संतप्त करके, पुत्रसहित कर्ण अर्जुनके तेजसे शान्त हो गया ॥ ४१ १/२ ॥

प्रताप्य पाण्डवान् सर्वान् पञ्चालांश्चास्त्रतेजसा ॥ ४२ ॥
वर्षित्वा शरवर्षेण प्रताप्य रिपुवाहिनीम् ।
श्रीमानिव सहस्रांशुर्जगत् सर्वं प्रताप्य च ॥ ४३ ॥
हतो वैकर्तनः कर्णः सपुत्रः सहवाहनः ।
अर्थिनां पक्षिसंघस्य कल्पवृक्षो निपातितः ॥ ४४ ॥
अस्त्रके तेजसे सम्पूर्ण पाण्डव और पांचालोंको संताप देकर, बाणोंकी वर्षाके द्वारा शत्रुसेनाको तपाकर तथा सहस्र किरणोंवाले तेजस्वी सूर्यके समान सम्पूर्ण संसारमें अपना प्रताप बिखेरकर वैकर्तन कर्ण पुत्र और वाहनोंसहित मारा गया। याचकरूपी पक्षियोंके समुदायके लिये जो कल्पवृक्षके समान था, वह कर्ण मार गिराया गया ॥ ४२—४४ ॥

ददानीत्येव योऽवोचन्न नास्तीत्यर्थितोऽर्थिभिः ।
सद्भिः सदा सत्पुरुषः स हतो द्वैरथे वृषः ॥ ४५ ॥
जो माँगनेपर सदा यही कहता था कि ‘मैं दूँगा।' श्रेष्ठ याचकोंके माँगनेपर जिसके मुँहसे कभी ‘नाहीं' नहीं निकला, वह धर्मात्मा कर्ण द्वैरथ युद्धमें मारा गया ॥ ४५ ॥

यस्य ब्राह्मणसात् सर्वं वित्तमासीन्महात्मनः ।
नादेयं ब्राह्मणेष्ववासीद् यस्य स्वमपि जीवितम् ॥ ४६ ॥
सदा स्त्रीणां प्रियो नित्यं दाता चैव महारथः ।
स वै पार्थास्त्रनिर्दग्धो गतः परमिकां गतिम् ॥ ४७ ॥
जिस महामनस्वी कर्णका सारा धन ब्राह्मणोंके अधीन था, ब्राह्मणोंके लिये जिसका कुछ भी, अपना जीवन भी अदेय नहीं था, जो स्त्रियोंको सदा प्रिय लगता था और प्रतिदिन दान किया करता था, वह महारथी कर्ण पार्थके बाणोंसे दग्ध हो परम गतिको प्राप्त हो गया ॥ ४६-४७ ॥

यमाश्रित्याकरोद् वैरं पुत्रस्ते स गतो दिवम् ।
आदाय तव पुत्राणां जयाशां शर्म वर्म च ॥ ४८ ॥
राजन्! जिसका सहारा लेकर आपके पुत्रने पाण्डवोंके साथ वैर किया था, वह कर्ण आपके पुत्रोंकी विजयकी आशा, सुख तथा कवच (रक्षा) लेकर स्वर्गलोकको चला गया ॥

हते कर्णे सरितो न प्रसस्रु- र्जगाम चास्तं सविता दिवाकरः । ग्रहश्च तिर्यग् ज्वलनार्कवर्णः सोमस्य पुत्रोऽभ्युदियाय तिर्यक् ॥ ४९ ॥ कर्णके मारे जानेपर नदियोंका प्रवाह रुक गया, सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और अग्नि तथा सूर्यके समान कान्तिमान् मंगल एवं सोमपुत्र बुध तिरछे होकर उदित हुए ॥ ४९ ॥

नभः पफालेव ननाद चोर्वी ववुश्च वाताः परुषाः सुघोराः । दिशो बभूवुर्ज्वलिताः सधूमा महार्णवाः सस्वनुश्चक्षुभ्रुश्च ॥ ५० ॥ आकाश फटने-सा लगा, पृथ्वी चीत्कार कर उठी, भयानक और रूखी हवा चलने लगी, सम्पूर्ण दिशाएँ धूमसहित अग्निसे प्रज्वलित-सी होने लगीं और महासागर भयंकर स्वरमें गर्जने तथा विक्षुब्ध होने लगे ॥ ५० ॥

सकाननाश्चाद्रिचयाश्चकम्पिरे प्रविव्यथुर्भूतगणाश्च सर्वे । बृहस्पतिः सम्परिवार्य रोहिणीं बभूव चन्द्रार्कसमो विशाम्पते ॥ ५१ ॥ वनोंसहित पर्वतसमूह काँपने लगे, सम्पूर्ण भूतसमुदाय व्यथित हो उठे। प्रजानाथ! बृहस्पति नामक ग्रह रोहिणी नक्षत्रको सब ओरसे घेरकर चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होने लगा ॥ ५१ ॥

हते तु कर्णे विदिशोऽपि जज्वलु- स्तमोवृता द्यौर्विचचाल भूमिः । पपात चोल्का ज्वलनप्रकाशा निशाचराश्चाप्यभवन् प्रहृष्टाः ॥ ५२ ॥ कर्णके मारे जानेपर दिशाओंके कोने-कोनेमें आग-सी लग गयी, आकाशमें अँधेरा छा गया, धरती डोलने लगी, अग्निके समान प्रकाशमान उल्का गिरने लगी और निशाचर प्रसन्न हो गये ॥ ५२ ॥

शशिप्रकाशाननमर्जुनो यदा क्षुरेण कर्णस्य शिरो न्यपातयत् । तदान्तरिक्षे सहसैव शब्दो बभूव हाहेति सुरैर्विमुक्तः ॥ ५३ ॥

जिस समय अर्जुनने क्षुरके द्वारा कर्णके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखवाले मस्तकको काट गिराया, उस समय आकाशमें देवताओंके मुखसे निकला हुआ हाहाकारका शब्द गूँज उठा ।। ५३ ।। सदेवगन्धर्वमनुष्यपूजितं निहत्य कर्णं रिपुमाहवेऽर्जुनः । रराज राजन् परमेण वर्चसा यथा पुरा वृत्रवधे शतक्रतुः ।। ५४ ।। राजन्! देवता, गन्धर्व और मनुष्योंद्वारा पूजित अपने शत्रु कर्णको युद्धमें मारकर अर्जुन अपने उत्तम तेजसे उसी प्रकार प्रकाशित होने लगे, जैसे पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध करके इन्द्र सुशोभित हुए थे ।। ५४ ।। ततो रथेनाम्बुदवृन्दनादिना शरन्नभोमध्यदिवाकरार्चिषा । पताकिना भीमनिनादकेतुना हिमेन्दुशङ्खस्फटिकावभासिना ।। ५५ ।। महेन्द्रवाहप्रतिमेन तायुभौ महेन्द्रवीर्यप्रतिमानपौरुषौ । सुवर्णमुक्तामणिवज्रविद्रुमै- रलंकृतावप्रतिमेन रंहसा ।। ५६ ।। नरोत्तमौ केशवपाण्डुनन्दनौ तदाहिताग्निदिवाकराविव । रणाजिरे वीतभयौ विरेजतुः समानयानाविव विष्णुवासवौ ।। ५७ ।। तदनन्तर नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुन समरांगणमें रथपर आरूढ़ हो अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी एक ही वाहनपर बैठे हुए भगवान् विष्णु और इन्द्रके सदृश भयरहित हो विशेष शोभा पाने लगे। वे जिस रथसे यात्रा करते थे, उससे मेघसमूहोंकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि होती थी, वह रथ शरत्-कालके मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेजसे उद्दीप्त हो रहा था, उसपर पताका फहराती थी और उसकी ध्वजापर भयानक शब्द करनेवाला वानर बैठा था। उसकी कान्ति हिम, चन्द्रमा, शंख और स्फटिकमणिके समान सुन्दर थी। वह रथ वेगमें अपना सानी नहीं रखता था और देवराज इन्द्रके रथके समान तीव्रगामी था। उसपर बैठे हुए दोनों नरश्रेष्ठ देवराज इन्द्रके समान शक्तिशाली और पुरुषार्थी थे तथा सुवर्ण, मुक्ता, मणि, हीरे और मूँगेके बने हुए आभूषण उनके श्रीअंगोंकी शोभा बढ़ाते थे ।। ५५–५७ ।। ततो धनुर्ज्यातलबाणनिःस्वनैः

प्रसह्य कृत्वा च रिपून् हतप्रभान् । संछादयित्वा तु कुरून् शरोत्तमैः कपिध्वजः पक्षिवरध्वजश्च ॥ ५८ ॥ हृष्टौ ततस्तावमितप्रभावौ मनांस्यरीणामवदारयन्तौ । सुवर्णजालावततौ महास्वनौ हिमावदातौ परिगृह्य पाणिभिः । चुचुम्बतुः शङ्खवरौ नृणां वरौ वराननाभ्यां युगपच्च दध्मतुः ॥ ५९ ॥ तत्पश्चात् धनुषकी प्रत्यंचा, हथेली और बाणके शब्दोंसे शत्रुओंको बलपूर्वक श्रीहीन करके, उत्तम बाणोंद्वारा कौरव-सैनिकोंको ढककर अमित प्रभावशाली नरश्रेष्ठ गरुडध्वज श्रीकृष्ण और कपिध्वज अर्जुन हर्षमें भरकर विपक्षियोंका हृदय विदीर्ण करते हुए हाथोंमें दो श्रेष्ठ शंख ले उन्हें अपने सुन्दर मुखोंसे एक ही साथ चूमने और बजाने लगे। उनके वे दोनों शंख सोनेकी जालीसे आवृत, बर्फके समान सफेद और महान् शब्द करनेवाले थे ॥ ५९ ॥ पाञ्चजन्यस्य निर्घोषो देवदत्तस्य चोभयोः । पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिशश्चैवान्वनादयत् ॥ ६० ॥ पांचजन्य तथा देवदत्त दोनों शंखोंकी गम्भीर ध्वनिने पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित कर दिया ॥ ६० ॥ वित्रस्ताश्चाभवन् सर्वे कौरवा राजसत्तम । शङ्खशब्देन तेनाथ माधवस्यार्जुनस्य च ॥ ६१ ॥ नृपश्रेष्ठ! श्रीकृष्ण और अर्जुनकी उस शंखध्वनिसे समस्त कौरव संत्रस्त हो उठे ॥ ६१ ॥ तौ शङ्खशब्देन निनादयन्तौ वनानि शैलान् सरितो गुहाश्च । वित्रासयन्तौ तव पुत्रसेनां युधिष्ठिरं नन्दयतां वरिष्ठौ ॥ ६२ ॥ अपने शंखनादसे नदियों, पर्वतों, कन्दराओं तथा काननोंको प्रतिध्वनित करके आपके पुत्रकी सेनाको भयभीत करते हुए वे दोनों श्रेष्ठतम वीर युधिष्ठिरका आनन्द बढ़ाने लगे ॥ ६२ ॥ ततः प्रयाताः कुरवो जवेन श्रुत्वैव शङ्खस्वनमीरयमाणम् । विहाय मद्राधिपतिं पतिं च

दुर्योधनं भारत भारतानाम् ॥ ६३ ॥
भारत! उस शंखध्वनिको सुनते ही समस्त कौरवयोद्धा मद्राज शल्य तथा भरतवंशियोंके अधिपति दुर्योधनको वहीं छोड़कर वेगपूर्वक भागने लगे ॥ ६३ ॥

महाहवे तं बहु रोचमानं
धनंजयं भूतगणाः समेताः ।
तदान्वमोदन्त जनार्दनं च
दिवाकरावभ्युदितौ यथैव ॥ ६४ ॥
उस समय उदित हुए दो सूर्योंके समान उस महासमरमें प्रकाशित होनेवाले अत्यन्त कान्तिमान् अर्जुन तथा भगवान् श्रीकृष्णके पास आकर समस्त प्राणी उनके कार्यका अनुमोदन करने लगे ॥ ६४ ॥

समाचितौ कर्णशरैः परंतपा-
वुभौ व्यभातां समरेऽच्युतार्जुनौ ।
तमो निहत्याभ्युदितौ यथामलौ
शशाङ्कसूर्यौ दिवि रश्मिमालिनौ ॥ ६५ ॥
समरभूमिमें कर्णके बाणोंसे व्याप्त हुए वे दोनों शत्रुसंतापी वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन अन्धकारका नाश करके आकाशमें उदित हुए निर्मल अंशुमाली सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ६५ ॥

विहाय तान् बाणगणानथागतौ
सुहृद्वृतावप्रतिमानविक्रमौ ।
सुखं प्रविष्टौ शिविरं स्वमीश्वरौ
सदस्यनिन्द्याविव विष्णुवासवौ ॥ ६६ ॥
उन बाणोंको निकालकर वे अनुपम पराक्रमी सर्वसमर्थ श्रीकृष्ण और अर्जुन सुहृदोंसे घिरे हुए छावनीपर आये और यज्ञमें पदार्पण करनेवाले भगवान् विष्णु तथा इन्द्रके समान वे दोनों ही सुखपूर्वक शिबिरके भीतर प्रविष्ट हुए ॥ ६६ ॥

तौ देवगन्धर्वमनुष्यचारणै-
र्महर्षिभिर्यक्षमहोरगैरपि ।
जयाभिवृद्ध्या परयाभिपूजितौ
हते तु कर्णे परमाहवे तदा ॥ ६७ ॥
उस महासमरमें कर्णके मारे जानेपर देवता, गन्धर्व, मनुष्य, चारण, महर्षि, यक्ष तथा बड़े-बड़े नागोंने भी ‘आपकी जय हो, वृद्धि हो’ ऐसा कहते हुए बड़ी श्रद्धासे उन दोनोंका समादर किया ॥ ६७ ॥

यथानुरूपं प्रतिपूजितावुभौ
प्रशस्यमानौ स्वकृतैर्गुणौघैः ।

ननन्दतुस्तौ ससुहृद्गणौ तदा
बलं नियम्येव सुरेशकेशवौ ॥ ६८ ॥

जैसे बलासुरका दमन करके देवराज इन्द्र और भगवान् विष्णु अपने सुहृदोंके साथ आनन्दित हुए थे, उसी प्रकार श्रीकृष्ण और अर्जुन कर्णका वध करके यथायोग्य पूजित तथा अपने उपार्जित गुणसमूहोंद्वारा भूरि-भूरि प्रशंसित हो हितैषी-सम्बन्धियोंसहित बड़े हर्षका अनुभव करने लगे ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि रणभूमिवर्णनं नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें रणभूमिका वर्णनविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९४ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2417)

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चनवतितमोऽध्यायः

कौरव-सेनाका शिविरकी ओर पलायन और शिविरोंमें प्रवेश

संजय उवाच

हते वैकर्तने राजन् कुरवो भयपीडिताः ।
वीक्षमाणा दिशः सर्वाः पर्यापेतुः सहस्रशः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! वैकर्तन कर्णके मारे जानेपर भयसे पीड़ित हुए सहस्रों कौरव योद्धा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए भाग निकले ॥ १ ॥

कर्णं तु निहतं दृष्ट्वा शत्रुभिः परमाहवे ।
भीता दिशो व्यकीर्यन्त तावकाः क्षतविक्षताः ॥ २ ॥
शत्रुओंने उस महायुद्धमें वैकर्तन कर्णको मार डाला है, यह देखकर आपके सैनिक भयभीत हो उठे थे। उनका सारा शरीर घावोंसे भर गया था। इसलिये वे भागकर सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखर गये ॥ २ ॥

ततोऽवहारं चक्रुस्ते योधाः सर्वे समन्ततः ।
निवार्यमाणाश्चोद्विग्नास्तावका भृशदुःखिताः ॥ ३ ॥
तब आपके समस्त योद्धा जो अत्यन्त दुःखी और उद्विग्न हो रहे थे, मना करनेपर सब ओरसे युद्ध बंद करके लौटने लगे ॥ ३ ॥

तेषां तन्मतमाज्ञाय पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
अवहारं ततश्चक्रे शल्यस्यानुमते नृप ॥ ४ ॥
नरेश्वर! उन सबका अभिप्राय जानकर राजा शल्यकी अनुमति ले आपके पुत्र दुर्योधनने सेनाको लौटनेकी आज्ञा दी ॥

कृतवर्मा रथैस्तूर्णं वृतो भारत तावकैः ।
नारायणावशेषैश्च शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ५ ॥
भारत! नारायणी-सेनाके जो वीर शेष रह गये थे, उनसे तथा आपके अन्य रथी योद्धाओंसे घिरा हुआ कृतवर्मा भी तुरंत शिविरकी ओर ही भाग चला ॥ ५ ॥

गान्धाराणां सहस्रेण शकुनिः परिवारितः ।
हतमाधिरथिं दृष्ट्वा शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ६ ॥
सहस्रों गान्धार योद्धाओंसे घिरा हुआ शकुनि भी अधिरथपुत्र कर्णको मारा गया देख छावनीकी ओर ही भागा ॥

कृपः शारद्वतो राजन् नागानीकेन भारत ।

महामेघनिभेनाशु शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ७ ॥ भरतवंशी नरेश! शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य मेघोंकी घटाके समान अपनी गजसेनाके साथ शीघ्रतापूर्वक शिविरकी ओर ही भाग चले ॥ ७ ॥ अश्वत्थामा ततः शूरो विनिःश्वस्य पुनः पुनः । पाण्डवानां जयं दृष्ट्वा शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ८ ॥ तदनन्तर शूरवीर अश्वत्थामा पाण्डवोंकी विजय देख बारंबार उच्छ्वास लेता हुआ छावनीकी ओर ही भागने लगा ॥ ८ ॥ संशप्तकावशिष्टेन बलेन महता वृतः । सुशर्मापि ययौ राजन् वीक्षमाणो भयार्दितः ॥ ९ ॥ राजन्! संशप्तकोंकी बची हुई विशाल सेनासे घिरा हुआ सुशर्मा भी भयसे पीड़ित हो इधर-उधर देखता हुआ छावनीकी ओर चल दिया ॥ ९ ॥ दुर्योधनोऽपि नृपतिर्हतसर्वस्वबान्धवः । ययौ शोकसमाविष्टश्चिन्तयन् विमना बहु ॥ १० ॥ जिसके भाई नष्ट हो गये थे और सर्वस्व लुट गया था, वह राजा दुर्योधन भी शोकमग्न, उदास और विशेष चिन्तित होकर शिविरकी ओर चल पड़ा ॥ १० ॥ छिन्नध्वजेन शल्यस्तु रथेन रथिनां वरः । प्रययौ शिबिरायैव वीक्षमाणो दिशो दश ॥ ११ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ राजा शल्यने भी जिसकी ध्वजा कट गयी थी, उस रथके द्वारा दसों दिशाओंकी ओर देखते हुए छावनीकी ओर ही प्रस्थान किया ॥ ११ ॥ ततोऽपरे सुबहवो भरतानां महारथाः । प्राद्रवन्त भयत्रस्ता ह्रियाविष्टा विचेतसः ॥ १२ ॥ भरतवंशियोंके दूसरे-दूसरे बहुसंख्यक महारथी भी भयभीत, लज्जित और अचेत होकर शिविरकी ओर दौड़े ॥ १२ ॥ असृक् क्षरन्तः सोद्विग्ना वेपमानास्तथातुराः । कुरवो दुद्रुवुः सर्वे दृष्ट्वा कर्णं निपातितम् ॥ १३ ॥ कर्णको मारा गया देख सभी कौरव-सैनिक खून बहाते और काँपते हुए उद्विग्न तथा आतुर होकर छावनीकी ओर भागने लगे ॥ १३ ॥ प्रशंसन्तोऽर्जुनं केचित् केचित् कर्णं महारथाः । व्यद्रवन्त दिशो भीताः कुरवः कुरुसत्तम ॥ १४ ॥ कुरुश्रेष्ठ! कौरव-महारथियोंमेंसे कुछ लोग अर्जुनकी प्रशंसा करते थे और कुछ कर्णकी। वे सब-के-सब भयभीत होकर चारों दिशाओंमें भाग खड़े हुए ॥ १४ ॥ तेषां योधसहस्राणां तावकानां महामृधे । नासीत्तत्र पुमान् कश्चिद् यो युद्धाय मनो दधे ॥ १५ ॥

आपके उन हजारों योद्धाओंमें वहाँ कोई भी ऐसा पुरुष नहीं था, जो अपने मनमें उस महासमरमें युद्धके लिये उत्साह रखता हो ॥ १५ ॥

हते कर्णे महाराज निराशाः कुरवोऽभवन् ।
जीवितेष्वपि राज्येषु दारेषु च धनेषु च ॥ १६ ॥
महाराज! कर्णके मारे जानेपर कौरव अपने राज्यसे, धनसे, स्त्रियोंसे और जीवनसे भी निराश हो गये ॥ १६ ॥

तान् समानीय पुत्रस्ते यत्नेन महता विभुः ।
निवेशाय मनो दध्रे दुःखशोकसमन्वितः ॥ १७ ॥
दुःख और शोकमें डूबे हुए आपके पुत्र राजा दुर्योधनने बड़े यत्नसे उन सबको साथ ले आकर छावनीमें विश्राम करनेका विचार किया ॥ १७ ॥

तस्याज्ञां शिरसा योधाः परिगृह्य विशाम्पते ।
विवर्णवदना राजन् न्यविशन्त महारथाः ॥ १८ ॥
प्रजानाथ! वे सब महारथी योद्धा दुर्योधनकी आज्ञा शिरोधार्य करके शिविरमें प्रविष्ट हुए। उन सबके मुखोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शिविरप्रयाणे पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कौरव-सेनाका शिविरकी ओर प्रस्थानविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥

युधिष्ठिरका रणभूमिमें कर्णको मारा गया देखकर प्रसन्न हो श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करना, धृतराष्ट्रका शोकमग्न होना तथा कर्णपर्वके श्रवणकी महिमा

⬅ विषय-सूची (TOC)

षण्णवतितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका रणभूमिमें कर्णको मारा गया देखकर प्रसन्न हो श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करना, धृतराष्ट्रका शोकमग्न होना तथा कर्णपर्वके श्रवणकी महिमा

संजय उवाच

तथा निपतिते कर्णे परसैन्ये च विद्रुते ।
आश्लिष्य पार्थं दाशार्हो हर्षाद् वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! जब कर्ण मारा गया और शत्रुसेना भाग चली, तब दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनको हृदयसे लगाकर बड़े हर्षके साथ इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

हतो वज्रभृता वृत्रस्त्वया कर्णो धनंजय ।
वृत्रकर्णवधं घोरं कथयिष्यन्ति मानवाः ॥ २ ॥
‘धनंजय! पूर्वकालमें वज्रधारी इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था और आज तुमने कर्णको मारा है। वृत्रासुर और कर्ण दोनोंके वधका वृत्तान्त बड़ा भयंकर है। मनुष्य सदा इसकी चर्चा करते रहेंगे ॥ २ ॥

वज्रेण निहतो वृत्रः संयुगे भूरितेजसा ।
त्वया तु निहतः कर्णो धनुषा निशितैः शरैः ॥ ३ ॥
‘वृत्रासुर युद्धमें महातेजस्वी वज्रके द्वारा मारा गया था; परंतु तुमने कर्णको धनुष एवं पैने बाणोंसे ही मार डाला है ॥ ३ ॥

तमिमं विक्रमं लोके प्रथितं ते यशस्करम् ।
निवेदयावः कौन्तेय कुरुराजस्य धीमतः ॥ ४ ॥
‘कुन्तीनन्दन! चलो, हम दोनों तुम्हारे इस विश्व-विख्यात और यशोवर्धक पराक्रमका वृत्तान्त बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिरको बतावें ॥ ४ ॥

वधं कर्णस्य संग्रामे दीर्घकालचिकीर्षितम् ।
निवेद्य धर्मराजाय त्वमानृण्यं गमिष्यसि ॥ ५ ॥
‘उन्हें दीर्घकालसे युद्धमें कर्णके वधकी अभिलाषा थी। आज धर्मराजको यह समाचार बताकर तुम उऋण हो जाओगे ॥ ५ ॥

वर्तमाने महायुद्धे तव कर्णस्य चोभयोः ।
द्रष्टुमायोधनं पूर्वमागतो धर्मनन्दनः ॥ ६ ॥