भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2407

ऋष्ट्यश्च पीता विमला विकोशाः प्रासाश्च दण्डैः कनकावभासैः ॥ १८ ॥ छत्राणि वालव्यजनानि शङ्खा- श्छिन्नापविद्धाश्च स्रजो विचित्राः । सुवर्णमय अंगदोंसे विभूषित धनुष, सोनेके विचित्र पंखवाले बाण, ऋष्टि, पानीदार एवं कोशरहित निर्मल खड्ग तथा सुनहरे डंडोंसे युक्त प्रास, छत्र, चँवर, शंख और विचित्र मालाएँ छिन्न-भिन्न होकर फेंकी पड़ी हैं ॥ कुथाः पताकाम्बरभूषणानि किरीटमाला मुकुटाश्च शुभ्राः ॥ १९ ॥ प्रकीर्णका विप्रकीर्णाश्च राजन् प्रवालमुक्तातरालाश्च हाराः । राजन्! हाथीकी पीठपर बिछाये जानेवाले कम्बल या झूल, पताका, वस्त्र, आभूषण, किरीटमाला, उज्ज्वल मुकुट, श्वेत चामर, मूँगे और मोतियोंके हार—से सब-के-सब इधर-उधर बिखरे पड़े हैं ॥ १९ १/२ ॥ आपीडकेयूरवराङ्गदानि ग्रैवेयनिष्काः ससुवर्णसूत्राः ॥ २० ॥ मण्युत्तमा वज्रसुवर्णमुक्ता रत्नानि चोच्चावचमङ्गलानि । गात्राणि चात्यन्तसुखोचितानि शिरांसि चेन्दुप्रतिमाननानि ॥ २१ ॥ देहांश्च भोगांश्च परिच्छदांश्च त्यक्त्वा मनोज्ञानि सुखानि चैव । स्वधर्मनिष्ठां महतीमवाप्य व्याप्याशु लोकान् यशसा गतास्ते ॥ २२ ॥ शिरोभूषण, केयूर, सुन्दर अंगद, गलेके हार, पदक, सोनेकी जंजीर, उत्तम मणि, हीरे, सुवर्ण तथा मुक्ता आदि छोटे-बड़े मांगलिक रत्न, अत्यन्त सुख भोगनेके योग्य शरीर, चन्द्रमाको भी लज्जित करनेवाले मुखसे युक्त मस्तक, देह, भोग, आच्छादन-वस्त्र तथा मनोरम सुख—इन सबको त्यागकर स्वधर्मकी पराकाष्ठाका पालन करते हुए सम्पूर्ण लोकोंमें अपने यशका विस्तार करके वे वीर सैनिक दिव्य लोकोंमें पहुँच गये हैं ॥ २०—२२ ॥ निवर्त दुर्योधन यान्तु सैनिका व्रजस्व राजन् शिबिराय मानद । दिवाकरोऽप्येष विलम्बते प्रभो