भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2408

पुनस्त्वमेवात्र नरेन्द्र कारणम् ॥ २३ ॥
दूसरोंको सम्मान देनेवाले राजा दुर्योधन! अब लौटो। इन सैनिकोंको भी जाने दो। शिबिरमें चलो। प्रभो! ये भगवान् सूर्य भी अस्ताचलपर लटक रहे हैं। नरेन्द्र! तुम्हीं इस नर-संहारके प्रधान कारण हो ॥ २३ ॥
इत्येवमुक्त्वा विरराम शल्यो
दुर्योधनं शोकपरीतचेताः ।
हा कर्ण हा कर्ण इति ब्रुवाण-
मार्तं विसंज्ञं भृशमश्रुनेत्रम् ॥ २४ ॥
दुर्योधनसे ऐसा कहकर राजा शल्य चुप हो गये। उनका चित्त शोकसे व्याकुल हो रहा था। दुर्योधन भी आर्त होकर 'हा कर्ण! हा कर्ण!' पुकारने लगा। वह सुध-बुध खो बैठा था। उसके नेत्रोंसे वेगपूर्वक आँसुओंकी अविरल धारा बह रही थी ॥ २४ ॥
तं द्रोणपुत्रप्रमुखा नरेन्द्राः
सर्वे समाश्वास्य मुहुः प्रयान्ति ।
निरीक्षमाणा मुहुरर्जुनस्य
ध्वजं महान्तं यशसा ज्वलन्तम् ॥ २५ ॥
द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तथा अन्य सभी नरेश बारंबार आकर दुर्योधनको सान्त्वना देते और अर्जुनके महान् ध्वजको, जो उनके उज्ज्वल यशसे प्रकाशित हो रहा था, देखते हुए फिर लौट जाते थे ॥ २५ ॥
नराश्वमातङ्गशरीरजेन
रक्तेन सिक्तां च तथैव भूमिम् ।
रक्ताम्बरस्रक् तपनीययोगा-
न्नारीं प्रकाशामिव सर्वगम्याम् ॥ २६ ॥
मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके शरीरसे बहते हुए रक्तकी धारासे वहाँकी भूमि ऐसी सिंच गयी थी कि लाल वस्त्र, लाल फूलोंकी माला तथा तपाये हुए सुवर्णके आभूषण धारण करके सबके सामने आयी हुई सर्वगम्या नारी (वेश्या)-के समान प्रतीत होती थी ॥ २६ ॥
प्रच्छन्नरूपां रुधिरेण राजन्
रौद्रे मुहूर्तेऽतिविराजमाने ।
नैवावतस्थुः कुरवः समीक्ष्य
प्रव्राजिता देवलोकाय सर्वे ॥ २७ ॥
राजन्! अत्यन्त शोभा पानेवाले उस रौद्रमुहूर्त (सायंकाल)-में, रुधिरसे जिसका स्वरूप छिप गया था, उस भूमिको देखते हुए कौरव-सैनिक वहाँ ठहर न सके। वे सब-के-सब देवलोककी यात्राके लिये उद्यत थे ॥ २७ ॥
वधेन कर्णस्य तु दुःखितास्ते