महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2409, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहा कर्ण हा कर्ण इति ब्रुवाणाः । द्रुतं प्रयाताः शिबिराणि राजन् दिवाकरं रक्तमवेक्षमाणाः ॥ २८ ॥ महाराज! समस्त कौरव कर्णके वधसे अत्यन्त दुःखी हो ‘हा कर्ण! हा कर्ण!’ की रट लगाते और लाल सूर्यकी ओर देखते हुए बड़े वेगसे शिबिरकी ओर चले ॥ २८ ॥
गाण्डीवमुक्तैस्तु सुवर्णपुङ्खैः शिलाशितैः शोणितदिग्धवाजैः । शरैश्चिताङ्गो युधि भाति कर्णो हतोऽपि सन् सूर्य इवांशुमाली ॥ २९ ॥ गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सुवर्णमय पंखवाले और शिलापर तेज किये हुए बाणोंसे कर्णका अंग-अंग बिंध गया था। उन बाणोंकी पाँखें रक्तमें डूबी हुई थीं। उनके द्वारा युद्धस्थलमें पड़ा हुआ कर्ण मर जानेपर भी अंशुमाली सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था ॥ २९ ॥
कर्णस्य देहं रुधिरावसिक्तं भक्तानुकम्पी भगवान् विवस्वान् । स्पृष्ट्वांशुभिर्लोहितरक्तरूपः सिष्णासुरभ्येति परं समुद्रम् ॥ ३० ॥ भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान् सूर्य खूनसे भीगे हुए कर्णके शरीरका किरणोंद्वारा स्पर्श करके रक्तके समान ही लालरूप धारणकर मानो स्नान करनेकी इच्छासे पश्चिम समुद्रकी ओर जा रहे थे ॥ ३० ॥
इतीव संचिन्त्य सुरर्षिसंघाः सम्प्रस्थिता यान्ति यथा निकेतनम् । संचिन्तयित्वा जनता विसस्रु- र्यथासुखं खं च महीतलं च ॥ ३१ ॥ इस युद्धके ही विषयमें सोच-विचार करते हुए देवताओं तथा ऋषियोंके समुदाय वहाँसे प्रस्थित हो अपने-अपने स्थानको चल दिये और इसी विषयका चिन्तन करते हुए अन्य लोग भी सुखपूर्वक अन्तरिक्ष अथवा भूतलपर अपने-अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ३१ ॥
तदद्भुतं प्राणभृतां भयंकरं निशाम्य युद्धं कुरुवीरमुख्ययोः । धनंजयस्याधिरथेश्च विस्मिताः प्रशंसमानाः प्रययुस्तदा जनाः ॥ ३२ ॥ कौरव तथा पाण्डवपक्षके उन प्रमुख वीर अर्जुन और कर्णका वह अद्भुत तथा प्राणियोंके लिये भयंकर युद्ध देखकर सब लोग आश्चर्यचकित हो उनकी प्रशंसा करते हुए