भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2413

जिस समय अर्जुनने क्षुरके द्वारा कर्णके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखवाले मस्तकको काट गिराया, उस समय आकाशमें देवताओंके मुखसे निकला हुआ हाहाकारका शब्द गूँज उठा ।। ५३ ।। सदेवगन्धर्वमनुष्यपूजितं निहत्य कर्णं रिपुमाहवेऽर्जुनः । रराज राजन् परमेण वर्चसा यथा पुरा वृत्रवधे शतक्रतुः ।। ५४ ।। राजन्! देवता, गन्धर्व और मनुष्योंद्वारा पूजित अपने शत्रु कर्णको युद्धमें मारकर अर्जुन अपने उत्तम तेजसे उसी प्रकार प्रकाशित होने लगे, जैसे पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध करके इन्द्र सुशोभित हुए थे ।। ५४ ।। ततो रथेनाम्बुदवृन्दनादिना शरन्नभोमध्यदिवाकरार्चिषा । पताकिना भीमनिनादकेतुना हिमेन्दुशङ्खस्फटिकावभासिना ।। ५५ ।। महेन्द्रवाहप्रतिमेन तायुभौ महेन्द्रवीर्यप्रतिमानपौरुषौ । सुवर्णमुक्तामणिवज्रविद्रुमै- रलंकृतावप्रतिमेन रंहसा ।। ५६ ।। नरोत्तमौ केशवपाण्डुनन्दनौ तदाहिताग्निदिवाकराविव । रणाजिरे वीतभयौ विरेजतुः समानयानाविव विष्णुवासवौ ।। ५७ ।। तदनन्तर नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुन समरांगणमें रथपर आरूढ़ हो अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी एक ही वाहनपर बैठे हुए भगवान् विष्णु और इन्द्रके सदृश भयरहित हो विशेष शोभा पाने लगे। वे जिस रथसे यात्रा करते थे, उससे मेघसमूहोंकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि होती थी, वह रथ शरत्-कालके मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेजसे उद्दीप्त हो रहा था, उसपर पताका फहराती थी और उसकी ध्वजापर भयानक शब्द करनेवाला वानर बैठा था। उसकी कान्ति हिम, चन्द्रमा, शंख और स्फटिकमणिके समान सुन्दर थी। वह रथ वेगमें अपना सानी नहीं रखता था और देवराज इन्द्रके रथके समान तीव्रगामी था। उसपर बैठे हुए दोनों नरश्रेष्ठ देवराज इन्द्रके समान शक्तिशाली और पुरुषार्थी थे तथा सुवर्ण, मुक्ता, मणि, हीरे और मूँगेके बने हुए आभूषण उनके श्रीअंगोंकी शोभा बढ़ाते थे ।। ५५–५७ ।। ततो धनुर्ज्यातलबाणनिःस्वनैः