महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2412, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहते कर्णे सरितो न प्रसस्रु- र्जगाम चास्तं सविता दिवाकरः । ग्रहश्च तिर्यग् ज्वलनार्कवर्णः सोमस्य पुत्रोऽभ्युदियाय तिर्यक् ॥ ४९ ॥ कर्णके मारे जानेपर नदियोंका प्रवाह रुक गया, सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और अग्नि तथा सूर्यके समान कान्तिमान् मंगल एवं सोमपुत्र बुध तिरछे होकर उदित हुए ॥ ४९ ॥
नभः पफालेव ननाद चोर्वी ववुश्च वाताः परुषाः सुघोराः । दिशो बभूवुर्ज्वलिताः सधूमा महार्णवाः सस्वनुश्चक्षुभ्रुश्च ॥ ५० ॥ आकाश फटने-सा लगा, पृथ्वी चीत्कार कर उठी, भयानक और रूखी हवा चलने लगी, सम्पूर्ण दिशाएँ धूमसहित अग्निसे प्रज्वलित-सी होने लगीं और महासागर भयंकर स्वरमें गर्जने तथा विक्षुब्ध होने लगे ॥ ५० ॥
सकाननाश्चाद्रिचयाश्चकम्पिरे प्रविव्यथुर्भूतगणाश्च सर्वे । बृहस्पतिः सम्परिवार्य रोहिणीं बभूव चन्द्रार्कसमो विशाम्पते ॥ ५१ ॥ वनोंसहित पर्वतसमूह काँपने लगे, सम्पूर्ण भूतसमुदाय व्यथित हो उठे। प्रजानाथ! बृहस्पति नामक ग्रह रोहिणी नक्षत्रको सब ओरसे घेरकर चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होने लगा ॥ ५१ ॥
हते तु कर्णे विदिशोऽपि जज्वलु- स्तमोवृता द्यौर्विचचाल भूमिः । पपात चोल्का ज्वलनप्रकाशा निशाचराश्चाप्यभवन् प्रहृष्टाः ॥ ५२ ॥ कर्णके मारे जानेपर दिशाओंके कोने-कोनेमें आग-सी लग गयी, आकाशमें अँधेरा छा गया, धरती डोलने लगी, अग्निके समान प्रकाशमान उल्का गिरने लगी और निशाचर प्रसन्न हो गये ॥ ५२ ॥
शशिप्रकाशाननमर्जुनो यदा क्षुरेण कर्णस्य शिरो न्यपातयत् । तदान्तरिक्षे सहसैव शब्दो बभूव हाहेति सुरैर्विमुक्तः ॥ ५३ ॥