भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2414

प्रसह्य कृत्वा च रिपून् हतप्रभान् । संछादयित्वा तु कुरून् शरोत्तमैः कपिध्वजः पक्षिवरध्वजश्च ॥ ५८ ॥ हृष्टौ ततस्तावमितप्रभावौ मनांस्यरीणामवदारयन्तौ । सुवर्णजालावततौ महास्वनौ हिमावदातौ परिगृह्य पाणिभिः । चुचुम्बतुः शङ्खवरौ नृणां वरौ वराननाभ्यां युगपच्च दध्मतुः ॥ ५९ ॥ तत्पश्चात् धनुषकी प्रत्यंचा, हथेली और बाणके शब्दोंसे शत्रुओंको बलपूर्वक श्रीहीन करके, उत्तम बाणोंद्वारा कौरव-सैनिकोंको ढककर अमित प्रभावशाली नरश्रेष्ठ गरुडध्वज श्रीकृष्ण और कपिध्वज अर्जुन हर्षमें भरकर विपक्षियोंका हृदय विदीर्ण करते हुए हाथोंमें दो श्रेष्ठ शंख ले उन्हें अपने सुन्दर मुखोंसे एक ही साथ चूमने और बजाने लगे। उनके वे दोनों शंख सोनेकी जालीसे आवृत, बर्फके समान सफेद और महान् शब्द करनेवाले थे ॥ ५९ ॥ पाञ्चजन्यस्य निर्घोषो देवदत्तस्य चोभयोः । पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिशश्चैवान्वनादयत् ॥ ६० ॥ पांचजन्य तथा देवदत्त दोनों शंखोंकी गम्भीर ध्वनिने पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित कर दिया ॥ ६० ॥ वित्रस्ताश्चाभवन् सर्वे कौरवा राजसत्तम । शङ्खशब्देन तेनाथ माधवस्यार्जुनस्य च ॥ ६१ ॥ नृपश्रेष्ठ! श्रीकृष्ण और अर्जुनकी उस शंखध्वनिसे समस्त कौरव संत्रस्त हो उठे ॥ ६१ ॥ तौ शङ्खशब्देन निनादयन्तौ वनानि शैलान् सरितो गुहाश्च । वित्रासयन्तौ तव पुत्रसेनां युधिष्ठिरं नन्दयतां वरिष्ठौ ॥ ६२ ॥ अपने शंखनादसे नदियों, पर्वतों, कन्दराओं तथा काननोंको प्रतिध्वनित करके आपके पुत्रकी सेनाको भयभीत करते हुए वे दोनों श्रेष्ठतम वीर युधिष्ठिरका आनन्द बढ़ाने लगे ॥ ६२ ॥ ततः प्रयाताः कुरवो जवेन श्रुत्वैव शङ्खस्वनमीरयमाणम् । विहाय मद्राधिपतिं पतिं च