महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2405, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशीर्णवर्माभरणाम्बरायुधै- वृता प्रशान्तैरिव तावकैर्मही ॥ ९ ॥
हाथी, रथ और घोड़ोंपर सवार होकर युद्ध करनेवाले यशस्वी योद्धा और पैदल वीर सामने लड़ते हुए शत्रुओंके हाथसे मारे गये हैं। उनके कवच, आभूषण, वस्त्र और आयुध सभी छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये हैं। इस प्रकार शान्त पड़े हुए आपके प्राणहीन योद्धाओंसे यह पृथ्वी पट गयी है ॥ ९ ॥
शरप्रहाराभिहतैर्महाबलै- रवेक्ष्यमाणैः पतितैः सहस्रशः । दिवश्च्युतैर्भूरतिदीप्तिमद्भि- र्नक्तं ग्रहैद्यौरमलप्रदीप्तैः ॥ १० ॥
बाणोंके प्रहारसे घायल होकर गिरे हुए सहस्रों महाबली योद्धा आकाशसे नीचे गिरे हुए अत्यन्त दीप्तिमान् एवं निर्मल प्रभासे प्रकाशित ग्रहोंके समान दिखायी देते हैं और उनसे ढकी हुई यह भूमि रातके समय उन ग्रहोंसे व्याप्त हुए आकाशके सदृश सुशोभित होती है ॥ १० ॥
प्रणष्टसंज्ञैः पुनरुच्छ्वसद्भि- र्मही बभूवानुगतैरिवाग्निभिः । कर्णार्जुनाभ्यां शरभिन्नगात्रै- र्हतैः प्रवीरैः कुरुसृञ्जयानाम् ॥ ११ ॥
कर्ण और अर्जुनके बाणोंसे जिनके अंग-अंग छिन्न-भिन्न हो गये हैं, उन मारे गये कौरव-संजय वीरोंकी लाशोंसे भरी हुई भूमि यज्ञमें स्थापित हुई अग्नियोंके द्वारा यज्ञभूमिके समान सुशोभित होती है। उनमेंसे कितने ही वीरोंकी चेतना लुप्त हो गयी है और कितने ही पुनः साँस ले रहे हैं ॥ ११ ॥
शरास्तु कर्णार्जुनबाहुमुक्ता विदार्य नागाश्वमनुष्यदेहान् । प्राणान् निरस्याशु महीं प्रतीयु- र्महोरगा वासमिवातिताम्राः ॥ १२ ॥
कर्ण और अर्जुनके हाथोंसे छूटे हुए बाण हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके उनके प्राण निकालकर तुरंत पृथ्वीमें घुस गये थे, मानो अत्यन्त लाल रंगके विशाल सर्प अपनी बिलमें जा घुसे हों ॥
हतैर्मनुष्याश्वगजैश्च संख्ये शरापविद्धैश्च रथैनरिन्द्र । धनंजयस्याधिरथेश्च मार्गणै- रगम्यरूपा वसुधा बभूव ॥ १३ ॥