महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2422, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराधेयं निहतं मत्वा समुत्तस्थौ युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥ उन दोनोंके हर्षोल्लासको देखकर राजा युधिष्ठिर यह समझ गये कि राधापुत्र कर्ण मारा गया; अतः वे शय्यासे उठ खड़े हुए और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाने लगे ॥ १४ ॥
उवाच च महाबाहुः पुनः पुनररिंदमः । वासुदेवार्जुनौ प्रेम्णा तावुभौ परिषस्वजे ॥ १५ ॥ शत्रुदमन महाबाहु युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण और अर्जुनसे बारंबार प्रेमपूर्वक बोलने और उन दोनोंको हृदयसे लगाने लगे ॥ १५ ॥
तत् तस्मै तद् यथावृत्तं वासुदेवः सहार्जुनः । कथयामास कर्णस्य निधनं यदुपुङ्गवः ॥ १६ ॥ उस समय अर्जुनसहित यदुकुलतिलक वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने कर्णके मारे जानेका सारा समाचार उन्हें यथावत्रूपसे कह सुनाया ॥ १६ ॥
ईषदउत्स्मयमानस्तु कृष्णो राजानमब्रवीत् । युधिष्ठिरं हतामित्रं कृताञ्जलिरथाच्युतः ॥ १७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण हाथ जोड़कर किंचित् मुस्कराते हुए, जिनका शत्रु मारा गया था, उस राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ॥ १७ ॥
दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च पाण्डवश्च वृकोदरः । त्वं चापि कुशली राजन् माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १८ ॥ ‘राजन्! बड़े सौभाग्यकी बात है कि गाण्डीवधारी अर्जुन, पाण्डव भीमसेन, पाण्डुकुमार माद्रीनन्दन नकुल-सहदेव और आप भी सकुशल हैं ॥ १८ ॥
मुक्ता वीरक्षयादस्मात् संग्रामाल्लोमहर्षणात् । क्षिप्रमुत्तरकालानि कुरु कार्याणि पाण्डव ॥ १९ ॥ ‘आप सब लोग वीरोंका विनाश करनेवाले इस रोमांचकारी संग्रामसे मुक्त हो गये। पाण्डुनन्दन! अब आगे जो कार्य करने हैं, उन्हें शीघ्र पूर्ण कीजिये ॥ १९ ॥
हतो वैकर्तनो राजन् सूतपुत्रो महारथः । दिष्ट्या जयसि राजेन्द्र दिष्ट्या वर्धसि भारत ॥ २० ॥ ‘राजन्! महारथी सूतपुत्र वैकर्तन कर्ण मारा गया, राजेन्द्र! सौभाग्यसे आप विजयी हो रहे हैं। भारत! आपकी वृद्धि हो रही है, यह परम सौभाग्यकी बात है ॥ २० ॥
यस्तु द्यूतजितां कृष्णां प्राहसत् पुरुषाधमः । तस्याद्य सूतपुत्रस्य भूमिः पिबति शोणितम् ॥ २१ ॥ ‘जिस नराधमने जूएमें जीती हुई द्रौपदीका उपहास किया था, आज पृथ्वी उस सूतपुत्र कर्णका रक्त पी रही है ॥ २१ ॥
शेतेऽसौ शरपूर्णाङ्गः शत्रुस्ते कुरुपुङ्गव । तं पश्य पुरुषव्याघ्र विभिन्नं बहुभिः शरैः ॥ २२ ॥