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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2423

‘कुरुपुंगव! आपका वह शत्रु रणभूमिमें सो रहा है और उसके सारे शरीरमें बाण भरे हुए हैं। नरव्याघ्र! अनेक बाणोंसे क्षत-विक्षत हुए उस कर्णको आप देखिये ।। २२ ।।

हतामित्रामिमामुर्वीमनुशाधि महाभुज ।
यत्तो भूत्वा सहास्माभिर्भुङ्क्ष्व भोगांश्च पुष्कलान् ।। २३ ।।
‘महाबाहो! आप सावधान होकर हम सब लोगोंके साथ इस निष्कंटक हुई पृथ्वीका शासन और प्रचुर भोगोंका उपभोग कीजिये' ।। २३ ।।

संजय उवाच

इति श्रुत्वा वचस्तस्य केशवस्य महात्मनः ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा दाशार्हं वाक्यमब्रवीत् ।। २४ ।।
संजय कहते हैं—राजन्! महात्मा श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे वार्तालाप आरम्भ किया ।। २४ ।।

दिष्ट्या दिष्ट्येति राजेन्द्र वाक्यं चेदमुवाच ह ।
नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दन ।। २५ ।।
त्वया सारथिना पार्थो यत्नवानहनञ्च तम् ।
न तच्चित्रं महाबाहो युष्मद्बुद्धिप्रसादजम् ।। २६ ।।
राजेन्द्र! 'अहो भाग्य! अहो भाग्य!' ऐसा कहकर युधिष्ठिर इस प्रकार बोले—‘महाबाहु देवकीनन्दन! आपके रहते यह महान् कार्य सम्पन्न होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। आप-जैसे सारथिके होते ही पार्थने प्रयत्नपूर्वक उसका वध किया है। महाबाहो! आपकी बुद्धिके प्रसादसे ऐसा होना आश्चर्य नहीं है' ।। २५-२६ ।।

प्रगृह्य च कुरुश्रेष्ठ साङ्गदं दक्षिणं भुजम् ।
उवाच धर्मभृत् पार्थ उभौ तौ केशवार्जुनौ ।। २७ ।।
कुरुश्रेष्ठ! इसके बाद धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने बाजूबंदविभूषित श्रीकृष्णका दाहिना हाथ अपने हाथमें लेकर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंसे कहा— ।। २७ ।।

नरनारायणौ देवौ कथितौ नारदेन मे ।
धर्मात्मानौ महात्मानौ पुराणावृषिसत्तमौ ।। २८ ।।
‘प्रभो! देवर्षि नारदने मुझसे कहा था कि आप दोनों धर्मात्मा, महात्मा, पुराणपुरुष तथा ऋषिप्रवर साक्षात् भगवान् नर और नारायण हैं ।। २८ ।।

असकृच्चापि मेधावी कृष्णद्वैपायनो मम ।
कथामेतां महाभाग कथयामास तत्त्ववित् ।। २९ ।।
‘महाभाग! परम बुद्धिमान् तत्त्ववेत्ता महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायनने भी बारंबार मुझसे यही बात कही है ।। २९ ।।

तव कृष्ण प्रसादेन पाण्डवोऽयं धनंजयः ।

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