महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2424, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिगायाभिमुखः शत्रून् न चासीद् विमुखः क्वचित् ॥ ३० ॥
‘श्रीकृष्ण! आपके प्रसादसे ही ये पाण्डुपुत्र धनंजय सदा सामने रहकर युद्धमें शत्रुओंपर विजयी हुए हैं और कभी युद्धसे मुँह नहीं मोड़ सके हैं॥ ३० ॥
जयश्चैव ध्रुवोऽस्माकं न त्वस्माकं पराजयः ।
यदा त्वं युधि पार्थस्य सारथ्यमुपजग्मिवान् ॥ ३१ ॥
‘प्रभो! जब आप युद्धमें अर्जुनके सारथि बने थे, तभी हमें यह विश्वास हो गया था कि हमलोगोंकी विजय निश्चित है, अटल है। हमारी पराजय नहीं हो सकती॥ ३१ ॥
भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च महात्मा गौतमः कृपः ।
अन्ये च बहवः शूरा ये च तेषां पदानुगाः ॥ ३२ ॥
त्वद्बुद्ध्या निहते कर्णे हता गोविन्द सर्वथा ।
‘गोविन्द! भीष्म, द्रोण, कर्ण, महात्मा गौतमवंशी कृपाचार्य तथा इनके पीछे चलनेवाले जो और भी बहुत-से शूरवीर हैं और रहे हैं, आपकी बुद्धिसे आज कर्णके मारे जानेपर उन सबका वध हो गया, ऐसा मैं मानता हूँ’॥ ३२ १/२ ॥
इत्युक्त्वा धर्मराजस्तु रथं हेमविभूषितम् ॥ ३३ ॥
श्वेतवर्णैर्हयैर्युक्तं कालवालैर्मनोजवैः ।
आस्थाय पुरुषव्याघ्रः स्वबलेनाभिसंवृतः ॥ ३४ ॥
प्रययौ स महाबाहुर्द्रष्टुमायोधनं तदा ।
कृष्णार्जुनाभ्यां वीराभ्यामनुमन्त्र्य ततः प्रियम् ॥ ३५ ॥
आभाषमाणस्तौ वीरावुभौ माधवफाल्गुनौ ।
स ददर्श रणे कर्णं शयानं पुरुषर्षभम् ॥ ३६ ॥
ऐसा कहकर पुरुषसिंह महाबाहु धर्मराज युधिष्ठिर श्वेतवर्ण और काली पूँछवाले, मनके समान वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णभूषित रथपर आरूढ़ हो अपनी सेनाके साथ युद्ध देखनेके लिये चले। श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों वीरोंके साथ प्रिय विषयपर परामर्श और उनसे वार्तालाप करते हुए युधिष्ठिरने रणभूमिमें सोये हुए पुरुषप्रवर कर्णको देखा ॥ ३३—३६ ॥
यथा कदम्बकुसुमं केसरैः सर्वतो वृतम् ।
चितं शरशतैः कर्णं धर्मराजो ददर्श सः ॥ ३७ ॥
जैसे कदम्बका फूल सब ओरसे केसरोंसे भरा होता है, उसी प्रकार कर्णका शरीर सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त था। धर्मराज युधिष्ठिरने इसी अवस्थामें उसे देखा ॥ ३७ ॥
गन्धतैलावसिक्ताभिः काञ्चनीभिः सहस्रशः ।
दीपिकाभिः कृतोद्योतं पश्यते वै वृषं तदा ॥ ३८ ॥
उस समय सुगन्धित तेलसे भरे हुए सहस्रों सोनेके दीपक जलाकर प्रकाश किया गया था। उसी उजालेमें वे धर्मात्मा कर्णको देख रहे थे॥ ३८ ॥