महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2425, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंछिन्नभिन्नकवचं बाणैश्च विदलीकृतम् । सपुत्रं निहतं दृष्ट्वा कर्णं राजा युधिष्ठिरः ॥ ३९ ॥ संजातप्रत्ययोऽतीव वीक्ष्य चैवं पुनः पुनः । प्रशशंस नरव्याघ्रावुभौ माधवपाण्डवौ ॥ ४० ॥ उसका कवच छिन्न-भिन्न हो गया था और सारा शरीर बाणोंसे विदीर्ण हो चुका था। उस अवस्थामें पुत्रसहित मरे हुए कर्णको देखकर बारंबार उसका निरीक्षण करके राजा युधिष्ठिरको इस बातपर पूरा-पूरा विश्वास हुआ। फिर वे पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ३९-४० ॥
अद्य राजास्मि गोविन्द पृथिव्यां भ्रातृभिः सह । त्वया नाथेन वीरेण विदुषा परिपालितः ॥ ४१ ॥ उन्होंने कहा—'गोविन्द! आप-जैसे विद्वान् और वीर स्वामी एवं संरक्षकके द्वारा सुरक्षित होकर आज मैं भाइयोंसहित इस भूमण्डलका राजा हो गया ॥ ४१ ॥
हतं श्रुत्वा नरव्याघ्रं राधेयमतिमानिनम् । निराशोऽद्य दुरात्मासौ धार्तराष्ट्रो भविष्यति ॥ ४२ ॥ जीविते चैव राज्ये च हते राधात्मजे रणे । त्वत्प्रसादाद् वयं चैव कृतार्थाः पुरुषर्षभ ॥ ४३ ॥ 'आज दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अत्यन्त अभिमानी नरव्याघ्र राधापुत्र कर्णके मारे जानेका वृत्तान्त सुनकर राज्य और जीवनसे भी निराश हो जायगा। पुरुषोत्तम! आपकी कृपासे रणभूमिमें राधापुत्र कर्णके मारे जानेपर हम सब लोग कृतार्थ हो गये ॥ ४२-४३ ॥
दिष्ट्या जयसि गोविन्द दिष्ट्या शत्रुन्निपातितः । दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च विजयी पाण्डुनन्दनः ॥ ४४ ॥ 'गोविन्द! बड़े भाग्यसे आपकी विजय हुई है। भाग्यसे ही हमारा शत्रु कर्ण आज मार गिराया गया है और सौभाग्यसे ही गाण्डीवधारी पाण्डुनन्दन अर्जुन विजयी हुए हैं' ॥ ४४ ॥
त्रयोदश समास्तीर्णा जागरणेन सुदुःखिताः । स्वप्स्यामोऽद्य सुखं रात्रौ त्वत्प्रसादान्महाभुज ॥ ४५ ॥ 'महाबाहो! अत्यन्त दुःखी होकर हमलोगोंने जागते हुए तेरह वर्ष व्यतीत किये हैं। आजकी रातमें आपकी कृपासे हमलोग सुखपूर्वक सो सकेंगे' ॥ ४५ ॥
संजय उवाच
एवं स बहुशो राजा प्रशशंस जनार्दनम् । अर्जुनं च कुरुश्रेष्ठं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४६ ॥