महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2431, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः कर्णे हते राजन् धार्तराष्ट्रः सुयोधनः ।
भृशं शोकार्णवे मग्नो निराशः सर्वतोऽभवत् ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! कर्णके मारे जानेपर धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन शोकके समुद्रमें डूब गया और सब ओरसे निराश हो गया ॥ ४ ॥
हा कर्ण हा कर्ण इति शोचमानः पुनः पुनः ।
कृच्छ्रात् स्वशिविरं प्राप्तो हतशेषैर्नृपैः सह ॥ ५ ॥
‘हा कर्ण! हा कर्ण!’ ऐसा कहकर बारंबार शोकग्रस्त हो मरनेसे बचे हुए नरेशोंके साथ वह बड़ी कठिनाईसे अपने शिविरमें आया ॥ ५ ॥
स समाश्वास्यमानोऽपि हेतुभिः शास्त्रनिश्चितैः ।
राजभिर्नालभच्छर्म सूतपुत्रवधं स्मरन् ॥ ६ ॥
राजाओंने शास्त्रनिश्चित युक्तियोंद्वारा उसे बहुत समझाया-बुझाया तो भी सूतपुत्रके वधका स्मरण करके उसे शान्ति नहीं मिली ॥ ६ ॥
स दैवं बलवन्मत्वा भवितव्यं च पार्थिवः ।
संग्रामे निश्चयं कृत्वा पुनर्युद्धाय निर्ययौ ॥ ७ ॥
उस राजा दुर्योधनने दैव और भवितव्यताको प्रबल मानकर संग्राम जारी रखनेका ही दृढ़ निश्चय करके पुनः युद्धके लिये प्रस्थान किया ॥ ७ ॥
शल्यं सेनापतिं कृत्वा विधिवद् राजपुङ्गवः ।
रणाय निर्ययौ राजा हतशेषैर्नृपैः सह ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ राजा दुर्योधन शल्यको विधिपूर्वक सेनापति बनाकर मरनेसे बचे हुए राजाओंके साथ युद्धके लिये निकला ।।
ततः सुतुमुलं युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ।
बभूव भरतश्रेष्ठ देवासुररणोपमम् ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर कौरव-पाण्डव सेनाओंमें घोर युद्ध हुआ, जो देवासुर-संग्रामके समान भयंकर था ॥ ९ ॥
ततः शल्यो महाराज कृत्वा कदनमाहवे ।
ससैन्योऽथ स मध्याह्ने धर्मराजेन घातितः ॥ १० ॥
महाराज! तत्पश्चात् सेनासहित शल्य युद्धमें बड़ा भारी संहार मचाकर मध्याह्नकालमें धर्मराज युधिष्ठिरके हाथसे मारे गये ॥ १० ॥
ततो दुर्योधनो राजा हतबन्धू रणाजिरात् ।
अपसृत्य ह्रदं घोरं विवेश रिपुजाद् भयात् ॥ ११ ॥
तदनन्तर राजा दुर्योधन अपने भाइयोंके मारे जानेपर समरांगणसे दूर जाकर शत्रुके भयसे भयंकर तालाबमें घुस गया ॥ ११ ॥
अथापराह्ने तस्याह्नः परिवार्य सुयोधनः ।