महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2432, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंह्रदादाहूय युद्धाय भीमसेनेन पातितः ॥ १२ ॥ इसके बाद उसी दिन अपराह्नकालमें दुर्योधनपर घेरा डालकर उसे युद्धके लिये तालाबसे बुलाकर भीमसेनेने मार गिराया ॥ १२ ॥
तस्मिन् हते महेष्वासे हतशिष्टास्त्रयो रथाः । संरम्भान्निशि राजेन्द्र जघ्नुः पांचालसोमकान् ॥ १३ ॥ राजेन्द्र! उस महाधनुर्धर दुर्योधनके मारे जानेपर मरनेसे बचे हुए तीन रथी—कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामाने रातमें सोते समय पांचालों और सोमकोंको रोषपूर्वक मार डाला ॥ १३ ॥
ततः पूर्वाह्णसमये शिबिरादेत्य संजयः । प्रविवेश पुरीं दीनो दुःखशोकसमन्वितः ॥ १४ ॥ तत्पश्चात् पूर्वाह्नकालमें दुःख और शोकमें डूबे हुए संजयने शिबिरसे आकर दीनभावसे हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ॥ १४ ॥
स प्रविश्य पुरीं सूतो भुजावुच्छ्रित्य दुःखितः । वेपमानस्ततो राज्ञः प्रविवेश निकेतनम् ॥ १५ ॥ पुरीमें प्रवेश करके दोनों बाँहें ऊपर उठाकर दुःखमग्न हो काँपते हुए संजय राजभवनके भीतर गये ॥ १५ ॥
रुरोद च नरव्याघ्र हा राजन्निति दुःखितः । अहो बत विनष्टाः स्म निधनेन महात्मनः ॥ १६ ॥ और रोते हुए दुःखी होकर बोले—'हा नरव्याघ्र नरेश! हा राजन्! बड़े शोककी बात है! महामनस्वी कुरुराजके निधनसे हम सर्वथा नष्टप्राय हो गये! ॥ १६ ॥
विधिश्च बलवानत्र पौरुषं तु निरर्थकम् । शक्रतुल्यबलाः सर्वे यथावध्यन्त पाण्डवैः ॥ १७ ॥ 'इस जगत्में भाग्य ही बलवान् है। पुरुषार्थ तो निरर्थक है, क्योंकि आपके सभी पुत्र इन्द्रके तुल्य बलवान् होनेपर भी पाण्डवोंके हाथसे मारे गये!' ॥ १७ ॥
दृष्ट्वैव च पुरे राजञ्जनः सर्वः स संजयम् । क्लेशेन महता युक्तं सर्वतो राजसत्तम ॥ १८ ॥ रुरोद च भृशोद्विग्नो हा राजन्निति विस्वरम् । आकुमारं नरव्याघ्र तत्र तत्र समन्ततः ॥ १९ ॥ आर्तनादं ततश्चक्रे श्रुत्वा विनिहतं नृपम् । राजन्! नृपश्रेष्ठ! हस्तिनापुरके सभी लोग संजयको सर्वथा महान् क्लेशसे युक्त देखकर अत्यन्त उद्विग्न हो 'हा राजन्!' ऐसा कहते हुए फूट-फूटकर रोने लगे। नरव्याघ्र! वहाँ चारों ओर बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सब लोग राजाको मारा गया सुन आर्तनाद करने लगे ॥ १८-१९ १/२ ॥