भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2433

धावतश्चाप्यपश्यामस्तत्र तान् पुरुषर्षभान् ॥ २० ॥ नष्टचित्तानिवोन्मत्तान् शोकेन भृशपीडितान् । हमलोगोंने देखा कि वे नगरके श्रेष्ठ पुरुष अचेत और उन्मत्त-से होकर शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो वहाँ दौड़ रहे हैं ॥ २० १/२ ॥

तथा स विह्वलः सूतः प्रविश्य नृपतिक़्षयम् ॥ २१ ॥ ददर्श नृपतिश्रेष्ठं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । इस प्रकार व्याकुल हुए संजयने राजभवनमें प्रवेश करके अपने स्वामी प्रज्ञाचक्षु नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्रका दर्शन किया ॥ २१ १/२ ॥

तथा चासीनमनघं समन्तात् परिवारितम् ॥ २२ ॥ स्नुषाभिर्भरतश्रेष्ठ गान्धार्या विदुरेण च । तथान्यैश्च सुहृद्भिश्च ज्ञातिभिश्च हितैषिभिः ॥ २३ ॥ तमेव चार्थं ध्यायन्तं कर्णस्य निधनं प्रति । भरतश्रेष्ठ! वे निष्पाप नरेश अपनी पुत्रवधुओं, गान्धारी, विदुर तथा अन्य हितैषी सुहृदों एवं बन्धु-बान्धवोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए बैठे थे और कर्णके मारे जानेसे होनेवाले परिणामका चिन्तन कर रहे थे ॥ २२-२३ १/२ ॥

रुदन्नेवाब्रवीद् वाक्यं राजानं जनमेजय ॥ २४ ॥ नातिहृष्टमनाः सूतो वाक्यसंदिग्धया गिरा । संजयोऽहं नरव्याघ्र नमस्ते भरतर्षभ ॥ २५ ॥ जनमेजय! उस समय संजयने खिन्नचित्त होकर रोते हुए ही संदिग्ध वाणीमें कहा—‘नरव्याघ्र! भरतश्रेष्ठ! मैं संजय हूँ। आपको नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥

मद्राधिपो हतः शल्यः शकुनिः सौबलस्तथा । उलूकः पुरुषव्याघ्र कैतव्यो दृढविक्रमः ॥ २६ ॥ ‘पुरुषसिंह! मद्राज शल्य, सुबलपुत्र शकुनि तथा जुआरीका पुत्र सुदृढ़पराक्रमी उलूक—ये सब-के-सब मारे गये ॥ २६ ॥

संशप्तका हताः सर्वे काम्बोजाश्च शकैः सह । म्लेच्छाश्च पर्वतीयाश्च यवना विनिपातिताः ॥ २७ ॥ ‘समस्त संशप्तक वीर, काम्बोज, शक, म्लेच्छ, पर्वतीय योद्धा और यवनसैनिक मार गिराये गये ॥ २७ ॥

प्राच्या हता महाराज दाक्षिणात्याश्च सर्वशः । उदीच्याश्च हताः सर्वे प्रतीच्याश्च नरोत्तमाः ॥ २८ ॥ ‘महाराज! पूर्वदेशके योद्धा मारे गये, समस्त दाक्षिणाात्योंका संहार हो गया तथा उत्तर और पश्चिमके सभी श्रेष्ठ मनुष्य मार डाले गये ॥ २८ ॥

राजानो राजपुत्राश्च सर्वे ते निहता नृप ।