भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2436

चेतना पाकर राजा धृतराष्ट्र अत्यन्त दुःखी हो थर-थर काँपने लगे और सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखकर विदुरसे इस प्रकार बोले—‘विद्वन्! महाज्ञानी विदुर! भरतभूषण! अब तुम्हीं मुझ पुत्रहीन और अनाथके सर्वथा आश्रय हो।’ इतना कहकर वे पुनः अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४४—४६ ॥

तं तथा पतितं दृष्ट्वा बान्धवा येऽस्य केचन । शीतैस्ते सिषिचुस्तोयैर्व्यव्यजुर्व्यजनैरपि ॥ ४७ ॥ उन्हें इस प्रकार गिरा हुआ देख उनके जो कोई बन्धु-बान्धव वहाँ मौजूद थे, उन्होंने राजाके शरीरपर ठंडे जलके छींटे दिये और व्यजन डुलाये ॥ ४७ ॥

स तु दीर्घेण कालेन प्रत्याश्वस्तो नराधिपः । तूष्णीं दध्यौ महीपालः पुत्रव्यसनकर्शितः ॥ ४८ ॥ फिर बहुत देरके बाद जब राजा धृतराष्ट्रको होश हुआ, तब वे पुत्रशोकसे पीड़ित हो चिन्तामग्न हो गये ॥

निःश्वसन् जिह्मग इव कुम्भक्षिप्तो विशाम्पते । संजयोऽप्यरुदत् तत्र दृष्ट्वा राजानमातुरम् ॥ ४९ ॥ प्रजानाथ! उस समय वे घड़ेमें रखे हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचने लगे। राजाको इस प्रकार आतुर देखकर संजय भी वहाँ रोने लगे ॥ ४९ ॥

तथा सर्वाः स्त्रियश्चैव गान्धारी च यशस्विनी । ततो दीर्घेण कालेन विदुरं वाक्यमब्रवीत् ॥ ५० ॥ धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठ मुह्यमानो मुहुर्मुहुः । गच्छन्तु योषितः सर्वा गान्धारी च यशस्विनी ॥ ५१ ॥ तथेमे सुहृदः सर्वे भ्राम्यते मे मनो भृशम् । फिर सारी स्त्रियाँ और यशस्विनी गान्धारी देवी भी फूट-फूटकर रोने लगीं। नरश्रेष्ठ! तत्पश्चात् बहुत देरके बाद बारंबार मोहित होते हुए धृतराष्ट्रने विदुरसे कहा—‘ये सारी स्त्रियाँ और यशस्विनी गान्धारी देवी भी यहाँसे चली जायँ। ये समस्त सुहृद् भी अब यहाँसे पधारें; क्योंकि मेरा चित्त अत्यन्त भ्रान्त हो रहा है’ ॥

एवमुक्तस्ततः क्षत्ता ताः स्त्रियो भरतर्षभ ॥ ५२ ॥ विसर्जयामास शनैर्वेपमानः पुनः पुनः । भरतश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर बारंबार काँपते हुए विदुरजीने उन सब स्त्रियोंको धीरे-धीरे बिदा कर दिया ॥ ५२ १/२ ॥

निष्चक्रमुस्ततः सर्वाः स्त्रियो भरतसत्तम ॥ ५३ ॥ सुहृदश्च तथा सर्वे दृष्ट्वा राजानमातुरम् । भरतभूषण! फिर वे सारी स्त्रियाँ और समस्त सुहृद्गण राजाको आतुर देखकर वहाँसे चले गये ॥ ५३ १/२ ॥