महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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ततो नरपतिं तत्र लब्धसंज्ञं परंतप ।। ५४ ।।
अवैक्षत् संजयो दीनं रोदमानं भृशातुरम् ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तदनन्तर होशमें आकर अत्यन्त आतुर हो दीनभावसे विलाप करते हुए राजा धृतराष्ट्रकी ओर संजयने देखा ।। ५४ १/२ ।।
प्राञ्जलिर्निःश्वसन्तं च तं नरेन्द्रं मुहुर्मुहुः ।
समाश्वासयत क्षत्ता वचसा मधुरेण च ।। ५५ ।।
उस समय बारंबार लंबी साँस खींचते हुए राजा धृतराष्ट्रको विदुरजीने हाथ जोड़कर अपनी मधुर वाणीद्वारा आश्वासन दिया ।। ५५ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि धृतराष्ट्रप्रमोहे प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें धृतराष्ट्रका मोहविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।।