महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2443, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनारायणा हता यत्र गोपाला युद्धदुर्मदाः । म्लेच्छाश्च बहुसाहस्राः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ४० ॥ जहाँ नारायण नामवाले रणदुर्मद ग्वाले और कई हजार म्लेच्छ योद्धा मौतके घाट उतार दिये गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है? ॥ ४० ॥
शकुनिः सौबलो यत्र कैतव्यश्च महाबलः । निहतः सबलो वीरः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ४१ ॥ जहाँ सुबलपुत्र महाबली शकुनि और उस जुआरीका पुत्र वीर उलूक दोनों ही सेनासहित मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ४१ ॥
एते चान्ये च बहवः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः । राजानो राजपुत्राश्च शूराः परिघबाहवः ॥ ४२ ॥ निहता बहवो यत्र किमन्यद् भागधेयतः । ये तथा और भी बहुत-से अस्त्रवेत्ता, रणदुर्मद, शूरवीर और परिघ-जैसी भुजाओंवाले राजा एवं राजकुमार अधिक संख्यामें मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण बताया जाय? ॥ ४२ १/२ ॥
यत्र शूरा महेष्वासाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥ ४३ ॥ बहवो निहताः सूत महेन्द्रसमविक्रमाः । नानादेशसमावृत्ताः क्षत्रिया यत्र संजय ॥ ४४ ॥ निहताः समरे सर्वे किमन्यद् भागधेयतः । सूत संजय! जहाँ समरभूमिमें नाना देशोंसे आये हुए देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी बहुत-से शूरवीर महाधनुर्धर, अस्त्रवेत्ता एवं युद्धदुर्मद क्षत्रिय सारे-के-सारे मार डाले गये, वहाँ भाग्यके अतिरिक्त दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ४३-४४ १/२ ॥
पुत्राश्च मे विनिहताः पौत्राश्चैव महाबलाः ॥ ४५ ॥ वयस्या भ्रातरश्चैव किमन्यद् भागधेयतः । हाय! मेरे महाबली पुत्र, पौत्र, मित्र और भाई-बन्धु सभी मार डाले गये, इसे दुर्भाग्यके सिवा और क्या कहूँ? ॥
भागधेयसमायुक्तो ध्रुवमुत्पद्यते नरः ॥ ४६ ॥ यस्तु भाग्यसमायुक्तः स शुभं प्राप्नुयान्नरः । निश्चय ही मनुष्य अपना-अपना भाग्य लेकर उत्पन्न होता है, जो सौभाग्यसे सम्पन्न होता है, उसे ही शुभ फलकी प्राप्ति होती है ॥ ४६ १/२ ॥
अहं वियुक्तस्तैर्भाग्यैः पुत्रैश्चैवेह संजय ॥ ४७ ॥ कथमद्य भविष्यामि वृद्धः शत्रुवशं गतः । संजय! मैं उन शुभकारक भाग्योंसे वंचित हूँ और पुत्रोंसे भी हीन हूँ। आज इस वृद्धावस्थामें शत्रुके वशमें पड़कर न जाने मेरी कैसी दशा होगी? ॥ ४७ १/२ ॥