भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2445

भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा सूतपुत्रं च घातितम् ।। ५६ ।। सेनापतिं प्रणेतारं किमकुर्वत मामकाः । धृतराष्ट्रने कहा—संजय! भीष्म और द्रोणाचार्यके वधका तथा युद्ध-संचालक सेनापति सूतपुत्र कर्णके विनाशका समाचार सुनकर मेरे पुत्रोंने क्या किया? ।। ५६ १/२ ।।

यं यं सेनाप्रणेतारं युधि कुर्वन्ति मामकाः ।। ५७ ।। अचिरेणैव कालेन तं तं निघ्नन्ति पाण्डवाः । मेरे पुत्र युद्धस्थलमें जिस-जिस वीरको अपना सेनापति बनाते थे, पाण्डव उस-उसको थोड़े ही समयमें मार गिराते थे ।। ५७ १/२ ।।

रणमूर्ध्नि हतो भीष्मः पश्यतां वः किरीटिना ।। ५८ ।। एवमेव हतो द्रोणः सर्वेषामेव पश्यताम् । युद्धके मुहानेपर तुमलोगोंके देखते-देखते भीष्मजी किरीटधारी अर्जुनके हाथसे मारे गये। इसी प्रकार द्रोणाचार्यका भी तुम सब लोगोंके सामने ही संहार हो गया ।। ५८ १/२ ।।

एवमेव हतः कर्णः सूतपुत्रः प्रतापवान् ।। ५९ ।। स राजकानां सर्वेषां पश्यतां वः किरीटिना । इसी तरह प्रतापी सूतपुत्र कर्ण भी राजाओंसहित तुम सब लोगोंके देखते-देखते किरीटधारी अर्जुनके हाथसे मारा गया ।। ५९ १/२ ।।

पूर्वमेवाहमुक्तो वै विदुरेण महात्मना ।। ६० ।। दुर्योधनापराधेन प्रजेयं विनशिष्यति । महात्मा विदुरने मुझसे पहले ही कहा था कि 'दुर्योधनके अपराधसे इस प्रजाका विनाश हो जायगा' ।। ६० १/२ ।।

केचिन्न सम्यक् पश्यन्ति मूढाः सम्यगवेक्ष्य च । तदिदं मम मूढस्य तथाभूतं वचः स्म तत् ।। ६१ ।। संसारमें कुछ मूढ़ मनुष्य ऐसे होते हैं, जो अच्छी तरह देखकर भी नहीं देख पाते। मैं भी वैसा ही मूढ़ हूँ। मेरे लिये वह वचन वैसा ही हुआ (मैं उसे सुनकर भी न सुन सका) ।। ६१ ।।

यदब्रवीत् स धर्मात्मा विदुरो दीर्घदर्शिवान् । तत्तथा समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः ।। ६२ ।। दूरदर्शी धर्मात्मा विदुरने पहले जो कुछ कहा था, वह सब उसी रूपमें सामने आया है। सत्यवादी महात्माका वचन सत्य होकर ही रहा ।। ६२ ।।

दैवोपहतचित्तेन यन्मया न कृतं पुरा । अनयस्य फलं तस्य ब्रूहि गावलगणे पुनः ।। ६३ ।।