भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2446

संजय! पहले दैवसे मेरी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये मैंने जो विदुरजीकी बात नहीं मानी, मेरे उस अन्यायका फल जैसे-जैसे प्रकट हुआ है, उसका वर्णन करो ।। ६३ ।। को वा मुखमनीकानामासीत् कर्णे निपातिते । अर्जुनं वासुदेवं च को वा प्रत्युद्ययौ रथी ।। ६४ ।। कर्णके मारे जानेपर सेनाके मुखस्थानपर खड़ा होनेवाला कौन था? कौन रथी अर्जुन और श्रीकृष्णका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा? ।। ६४ ।। केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं मद्रराजस्य संयुगे । वामं च योद्धुकामस्य के वा वीरस्य पृष्ठतः ।। ६५ ।। युद्धस्थलमें जूझनेकी इच्छावाले मद्रराज शल्यके दाहिने या बायें पहियेकी रक्षा किन लोगोंने की? अथवा उस वीर सेनापतिके पृष्ठ-रक्षक कौन थे? ।। ६५ ।। कथं च वः समेतानां मद्रराजो महारथः । निहतः पाण्डवैः संख्ये पुत्रो वा मम संजय ।। ६६ ।। संजय! तुम सब लोगोंके एक साथ रहते हुए भी महारथी मद्रराज शल्य अथवा मेरा पुत्र दुर्योधन दोनों ही तुम्हारे सामने पाण्डवोंके हाथसे कैसे मारे गये? ।। ६६ ।। ब्रूहि सर्वं यथातत्त्वं भरतानां महाक्षयम् । यथा च निहतः संख्ये पुत्रो दुर्योधनो मम ।। ६७ ।। तुम भरतवंशियोंके इस महान् विनाशका सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे बताओ। साथ ही यह भी कहो कि युद्धस्थलमें मेरा पुत्र दुर्योधन किस प्रकार मारा गया? ।। ६७ ।। पञ्चालाश्च यथा सर्वे निहताः सपदानुगाः । धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ।। ६८ ।। समस्त पांचाल-सैनिक अपने सेवकोंसहित कैसे मारे गये? धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंका वध किस प्रकार हुआ? ।। ६८ ।। पाण्डवाश्च यथा मुक्तास्तथोभौ माधवौ युधि । कृपश्च कृतवर्मा च भारद्वाजस्य चात्मजः ।। ६९ ।। पाँचों पाण्डव, दोनों मधुवंशी वीर श्रीकृष्ण और सात्यकि, कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा—ये युद्धस्थलसे किस प्रकार जीवित बच गये? ।। ६९ ।। यद् यथा यादृशं चैव युद्धं वृत्तं च साम्प्रतम् । अखिलं श्रोतुमिच्छामि कुशलो ह्यसि संजय ।। ७० ।। संजय! जो युद्धका वृत्तान्त जिस प्रकार और जैसे संघटित हुआ हो, वह सब इस समय मैं सुनना चाहता हूँ। तुम वह सब बतानेमें कुशल हो ।। ७० ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे द्वितीयोऽध्यायः ।। २ ।।