महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2454, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरेषामात्मनश्चैव सैन्ये ते समुपाद्रवत् ॥ ४५ ॥ प्रजानाथ! उन सबके भाग जानेपर कुरुराज दुर्योधनने शत्रुपक्षकी और अपनी दोनों ही सेनाओंपर आक्रमण किया ॥
ततो दुर्योधनः सर्वानजुहावाथ पाण्डवान् । युद्धाय भरतश्रेष्ठ देवानिव पुरा बलिः ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें राजा बलिने देवताओंको युद्धके लिये ललकारा था, उसी प्रकार दुर्योधनने समस्त पाण्डवोंका आह्वान किया ॥ ४६ ॥
त एनमभिगर्जन्तं सहिताः समुपाद्रवन् । नानाशस्त्रसृजः क्रुद्धा भर्त्सयन्तो मुहुर्मुहुः ॥ ४७ ॥ तब वे पाण्डवयोध्दा अत्यन्त कुपित हो गर्जना करनेवाले दुर्योधनको बारंबार फटकारते और क्रोधपूर्वक नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए एक साथ ही उसपर टूट पड़े ॥
दुर्योधनोऽप्यसम्भ्रान्तस्तानरीन् व्यधमच्छरैः । तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् ॥ ४८ ॥ यदेनं पाण्डवाः सर्वे न शेकुरतिवर्तितुम् । दुर्योधन भी बिना किसी घबराहटके अपने बाणोंद्वारा उन शत्रुओंको छिन्न-भिन्न करने लगा। वहाँ हमलोगोंने आपके पुत्रका अद्भुत पराक्रम देखा कि समस्त पाण्डव मिलकर भी उसे लाँघकर आगे न बढ़ सके ॥ ४८ १/२ ॥
नातिदूरापयातं च कृतबुद्धिः पलायने ॥ ४९ ॥ दुर्योधनः स्वकं सैन्यमपश्यद् भृशविक्षतम् । दुर्योधनने देखा कि मेरी सेना अत्यन्त घायल हो रणभूमिसे पलायन करनेका विचार रखकर भाग रही है, परंतु अधिक दूर नहीं गयी है ॥ ४९ १/२ ॥
ततोऽवस्थाप्य राजेन्द्र कृतबुद्धिस्तवात्मजः ॥ ५० ॥ हर्षयन्निव तान् योधांस्ततो वचनमब्रवीत् । राजेन्द्र! तब युद्धका ही दृढ़ निश्चय रखनेवाले आपके पुत्रने उन समस्त सैनिकोंको खड़ा करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए कहा— ॥ ५० १/२ ॥
न तं देशं प्रपश्यामि पृथिव्यां पर्वतेषु च ॥ ५१ ॥ यत्र यातान्न वो हन्युः पाण्डवाः किं सृतेन वः । ‘वीरो! मैं भूतलपर और पर्वतोंमें भी कोई ऐसा स्थान नहीं देखता, जहाँ चले जानेपर तुमलोगोंको पाण्डव मार न सकें; फिर तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है? ॥ ५१ १/२ ॥
स्वल्पं चैव बलं तेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ ॥ ५२ ॥ यदि सर्वेऽत्र तिष्ठामो ध्रुवं नो विजयो भवेत् ।