भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2455

'पाण्डवोंके पास थोड़ी-सी ही सेना शेष रह गयी है और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन भी बहुत घायल हो चुके हैं। यदि हम सब लोग यहाँ डटे रहें तो निश्चय ही हमारी विजय होगी॥ ५२ १/२॥

विप्रयातांस्तु वो भिन्नान् पाण्डवाः कृतकिल्बिषान्॥ ५३ ॥ अनुसृत्य हनिष्यन्ति श्रेयो नः समरे वधः। 'यदि तुमलोग पृथक्-पृथक् होकर भागोगे तो पाण्डव तुम सभी अपराधियोंका पीछा करके तुम्हें मार डालेंगे, अतः युद्धमें ही मारा जाना हमारे लिये श्रेयस्कर होगा॥ ५३ १/२॥

सुखः सांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम्॥ ५४ ॥ मृतो दुःखं न जानीते प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते। 'क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीरोंके लिये संग्रामभूमिमें होनेवाली मृत्यु ही सुखद है; क्योंकि वहाँ मरा हुआ मनुष्य मृत्युके दुःखको नहीं जानता और मृत्युके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है॥ ५४ १/२॥

शृण्वन्तु क्षत्रियाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः॥ ५५ ॥ द्विषतो भीमसेनस्य वशमेष्यथ विद्रुताः। 'जितने क्षत्रिय यहाँ आये हैं वे सब सुनें—'तुमलोग भागनेपर अपने शत्रु भीमसेनके अधीन हो जाओगे॥ ५५ १/२॥

पितामहैराचरितं न धर्मं हातुमर्हथ॥ ५६ ॥ नान्यत् कर्मास्ति पापीयः क्षत्रियस्य पलायनात्। 'इसलिये अपने बाप-दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए धर्मका परित्याग न करो। क्षत्रियके लिये युद्ध छोड़कर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई अत्यन्त पापपूर्ण कर्म नहीं है॥ ५६ १/२॥

न युद्धधर्माच्छ्रेयान् हि पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः॥ ५७ ॥ सुचिरेणार्जिताँल्लोकान् सद्यो युद्धात् समश्रुते। 'कौरवो! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्गका श्रेष्ठ मार्ग नहीं है। दीर्घकालतक पुण्यकर्म करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यलोकोंको वीर क्षत्रिय युद्धसे तत्काल प्राप्त कर लेता है'॥ ५७ १/२॥

तस्य तद् वचनं राज्ञः पूजयित्वा महारथाः॥ ५८ ॥ पुनरेवाभ्यवर्तन्त क्षत्रियाः पाण्डवान् प्रति। पराजयममृष्यन्तः कृतचित्ताश्च विक्रमे॥ ५९ ॥ राजा दुर्योधनकी उस बातका आदर करके वे महारथी क्षत्रिय पुनः युद्ध करनेके लिये पाण्डवोंके सामने आये। उन्हें पराजय असह्य हो उठी थी; इसलिये उन्होंने पराक्रम करनेमें ही मन लगाया था॥ ५८-५९॥