भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2460, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2460

‘देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी अर्जुनको हम चार दाँतवाले गजराजके समान अपनी सेनामें प्रवेश करते देखते हैं ॥ २३ ॥ विक्षोभयन्तं सेनां ते त्रासयन्तं च पार्थिवान् । धनंजयम्पश्याम नलिनीमिव कुञ्जरम् ॥ २४ ॥ ‘जैसे मतवाला हाथी तालाबमें घुसकर उसे मथ डालता है, उसी प्रकार हमने अर्जुनको तुम्हारी सेनाको मथते और राजाओंको भयभीत करते देखा है ॥ २४ ॥ त्रासयन्तं तथा योधान् धनुर्घोषेण पाण्डवम् । भूय एनमपश्याम सिंहं मृगगणानिव ॥ २५ ॥ ‘जैसे सिंह मृगोंके झुंडको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार पाण्डुकुमार अर्जुन अपने धनुषकी टंकारसे तुम्हारे समस्त योद्धाओंको बारंबार भयभीत करते दिखायी दिये हैं ॥ २५ ॥ सर्वलोकमहेष्वासौ वृषभौ सर्वधन्विनाम् । आमुक्तकवचौ कृष्णौ लोकमध्ये विचेरतुः ॥ २६ ॥ ‘अपने अंगोंमें कवच धारण किये श्रीकृष्ण और अर्जुन, जो सम्पूर्ण विश्वके महाधनुर्धर और सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ हैं, योद्धाओंके समूहमें निर्भय विचरते हैं ॥ २६ ॥ अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत । संग्रामस्यातिघोरस्य वध्यतां चाभितो युधि ॥ २७ ॥ ‘भारत! परस्पर मार-काट मचाते हुए दोनों ओरसे योद्धाओंके इस अत्यन्त भयंकर संग्रामको आरम्भ हुए आज सत्रह दिन हो गये ॥ २७ ॥ वायुनेव विधूतानि तव सैन्यानि सर्वतः । शरदम्भोदजालानि व्यशीर्यन्त समन्ततः ॥ २८ ॥ ‘जैसे हवा शरद्-ऋतुके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनकी मारसे तुम्हारी सेनाएँ सब ओर तितर-बितर हो गयी हैं ॥ २८ ॥ तां नावमिव पर्यस्तां वातधूतां महार्णवे । तव सेनां महाराज सव्यसाची व्यकम्पयत् ॥ २९ ॥ ‘महाराज! जैसे महासागरमें हवाके थपेड़े खाकर नाव डगमगाने लगती है, उसी प्रकार सव्यसाची अर्जुनने तुम्हारी सेनाको कँपा डाला है ॥ २९ ॥ क्व नु ते सूतपुत्रोऽभूत् क्व नु द्रोणः सहानुगः । अहं क्व च क्व चात्मा ते हार्दिक्यश्च तथा क्व नु ॥ ३० ॥ दुःशासनश्च ते भ्राता भ्रातृभिः सहितः क्व नु । बाणगोचरसम्प्राप्तं प्रेक्ष्य चैव जयद्रथम् ॥ ३१ ॥ ‘उस दिन जयद्रथको अर्जुनके बाणोंका निशाना बनते देखकर भी तुम्हारा कर्ण कहाँ चला गया था? अपने अनुयायियोंके साथ आचार्य द्रोण कहाँ थे? मैं कहाँ था? तुम कहाँ थे?

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